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मनोहरसिंह राठौड़ के कथाकार श्री हरिप्रकाश राठी के साथ बातचीत के अंश

प्रश्न 1: आपने लिखना ही क्यों चुना और इसमें कहानी विधा अपनाने का विशेष कारण ?

उत्तर: मैंने लिखना चुना नहीं, मेरे भीतर  का लेखक यकायक प्रगट हो गया। अगर मैं चुनता तो इसे यौवन में ही चुन लेता। शायद यह हुनर मुझमें बीज रूप में विद्यमान था, समय आते ही प्रगट हो गया। मेरी पहली कहानी ‘अमरूद का पेड़’ लिखने के पूर्व मैंने पहले कभी कोई कहानी, लेख नहीं लिखा। यह कहानी भी, जैसा कि मैंने पूर्व में बताया, स्वैछिक सेवानिवृत्ति के पश्चात् मेरे खाली समय का रेचन था। इस कहानी की सफलता एवं इससे मिली पाठकीय प्रतिक्रियाओं ने मेरे लेखन को रवानी दी। विश्वभर में  ऐसे अनेक लेखक हैं जिन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में बहुत सुंदर लेखन किया। तुलसी ने मानस 71 वर्ष में प्रारम्भ की एवं 74 में समाप्त किया। पश्चिम में भी मार्क ट्विन, हेनरी मिलर आदि अनेक लेखक हैं जिन्होंने उत्तरार्ध में लेखन का आगाज किया। इसमें भारत के निरद सी चौधरी का नाम भी जोड़ा जा सकता है। लेखन संवेदनाओं की गंगोत्री है, यह गुप्त गंगा जाने कब प्रगट हो जाए। लेखन का प्रारम्भ चूंकि मैंने देरी से किया एवं सबसे पहले कहानी विधा से किया अतः इस विधा में वर्षों लिखता रहा। हर बार मुझे लगा अभी पूर्ण बिंदु आना है। अभी भी मुझे ऐसा ही लगता है हालांकि मैंने 500 से ऊपर संपादकीय पृष्ठ पर लेख भी लिखे है एवं वे काफी जनप्रिय भी रहे। कुछ लघु-कथाएं भी लिखी हैं पर मुझे यह विधा रास नहीं आई। यहां दर्शन विस्तार नहीं पाता। यह संतोष कहानी लेखन में ही मिलता है। अब जब कि कहानियां लंबी होने लगी हैं, उपन्यास लिखने की इच्छा बल पकड़ने लगी है, शायद कुछ समय में लिख भी लूं। हां, अब तक जो भी लिखा है गद्य में लिखा है। मुझे लगता है मुझमें कविता रचने का हुनर नहीं है, आधी-अधूरी मैं लिखना नहीं चाहता । 

प्रश्न 2: अच्छा यह बताइए, आपकी पहली कहानी कब और किस पत्रिका में छपी ?  
उत्तर: मेरी पहली कहानी ‘अमरूद का पेड़ ’ राजस्थान पत्रिका में 02 जनवरी 2002 में प्रकाशित हुई। 

प्रश्न 3: आप कहानियां क्यों लिखते हैं ?
उत्तर:  मेरी सभी कहानियां मैंने यूनियन बैंक से वर्ष 2001 में स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के पश्चात् लिखी हैं। तब मेरी उम्र 45 वर्ष थी एवं मेरे पास नौकरी, परिवेश की घटनाओं, जीवन के अनूभूत सत्यों का एक लंबा अनुभव था। मेरे मत में कोई भी घटना, अनुभव जो लेखक को छूता है, वाईब्रेट करता है, तड़प पैदा करता है, लेखक उसी के इर्दगिर्द कहानियां रचता है। इन सबसे प्रभावित होकर वह अपने मन का रेचन करता है, अपने समय के यथार्थ, अनुभव को जैसा भी उसने देखा, समझा, भोगा शब्दों में पिरोता है एवं यहीं से कहानी का उद्भव होता है। मैंने अब तक जो भी रचा है, गद्य में ही कहानी, लघु-कथा, स्तम्भ-लेखन आदि के रूप में रचा। यही मेरी विधा है। 


प्रश्न 4: आप कहानी पत्र पत्रिकाओं की मांग पर लिखते हैं या स्वतःस्फूर्त विचारों से लिखते हैं। 
उत्तरः क्या ऐसा संभव है ? मुझसे अब तक किसी  पत्रिका ने ऐसी कोई मांग नहीं की। कहानी तो समय के गर्भ में पलने वाला एक वलवला है। कहानी बारिश की तरह होती है, कब बारिश हो जाए कहा नहीं जा सकता, कहानी भी कब प्रगट हो जाए कह नहीं सकते। एक क्षण, एक घटना, एक चरित्र, एक दृश्य आपको इतना वाइब्रेट कर देता है कि आप बलात, प्रेरे हुए से लिखने लगते हैं। कहानी की बारिश होने के पूर्व भी चिंतन उसी तरह उद्वेलित होता है जैसे बारिश आने के पूर्व बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं, बिजलियां कौंधती हैं। यह उमड़-घुमड़ ही कहानी रचवाता है। 

प्रश्न 5: कहानी का कथानक या खाका पहले से तय  करने के पश्चात उसके अनुसार कहानी रचते हैं या लेखन के समय तारतम्य बनता चलता है ?
उत्तरः मूल कथानक मोटे तौर पर समुद्र में तैरने वाले बर्फ खण्ड की तरह मस्तिष्क में तैरता है। आगाज कुछ दुष्कर होता है पर एक बार गति पकड़ते ही बर्फ खण्ड पिछलने लगता है एव कहानी नदी की तरह अनेक बल खाती हुई अपना रास्ता खुद बना लेती है। अंजाम बहुधा वो नहीं होता जो हम सोचते हैं, सच कहूं अनेक बार तो कथानक भी बदल जाते हैं। कहानी किसी अगोचर तत्व से प्रगट होती है, उसका गोचर रूप कहानी पूरा होने पर ही जान पाते हैं। लेखक भी बहुधा उससे अनभिज्ञ होता है।  

प्रश्न 6: कहानियों में कथ्य और कलात्मक संतुलन की कोई सीमा तय होनी चाहिए या कहानी कथ्य प्रधान होनी चाहिए ?
उत्तर: यह ठीक वैसा ही प्रश्न है कि शराब में कितना एवं कैसा पानी अथवा सोडा मिलाया जाय कि उसका यथेष्ट आनन्द मिले। सत, रज एवं तम स्वभावों में रची इस दुनिया में मनुष्य की रुचि एवं स्वभाव-वैविध्य इतना अधिक है कि कौनसा कथ्य, कहन किसे पसन्द आयेगा एवं कौनसी बात, प्रस्तुति को कोई कला मानेगा, कहना मुश्किल है। कहानी, कथ्य मेरे मत में बहती नदी की तरह सहज रूप से प्रवाहित होना चाहिये, कला तब स्वतः प्रकट हो जायेगी। कहानी का आनन्द तब है जब लिखते हुए लेखक के मन की गांठे खुल जाये एवं पढ़ते हुए पाठक की। लेखक-पाठक की यह एकलयता ही कथ्य, कला दोनों को उत्कर्ष तक पहुंचाती है। कहानी कथ्य-कला दोनों है लेकिन कहानी न कथ्य की रस्सी में बंधी हो न कला की। कहानी हवा के उन्मान उड़नी चाहिए। कहानी लेखक-पाठक दोनों को फुहार की तरह भीगो दे। अन्तरभीगी आतमा हरी भरी वनराय की स्थिति होते ही कथ्य,कला दोनों शिखर छू जाते हैं। यहां कोई अनुपात निश्चित मापक नहीं है। 


प्रश्न 7: आपकी कहानियों में कहावतें, मुहावरे अधिक होते हुए भी अखरते नहीं, चार चांद लगा देते हैं। आपके मस्तिष्क में आखिर कैसे आते होंगे ?
उत्तर: मेरे पिता बहुधा बोलते हुए मुहावरे प्रयोग करते थे। वे मुहावरों/लोकोक्तियों की पुस्तक भी पढ़ते थे, हमें भी पढ़ने को कहते थे, यह उत्स वहीं से आया होगा। हमारे पुस्तकों की दुकान थी। मुझे भी सैकड़ों मुहावरे याद हैं, अनेक बार दैनन्दिनी बोलचाल में प्रयोग भी करता हूं। इसी कारण मेरी कहानियों में इनका प्रयोग सहज हो गया। निःसंदेह मुहावरे भाषा का लालित्य है, कहानी में चार चांद लगा देते हैं। 

प्रश्न 8: आपको कौन-सा विषय या क्षेत्र अधिक प्रिय है जिस पर अधिक कहानी लिखने को मन करता है ?
उत्तरः विषय तो जैसा कि मैंने कहा समयानुकूल नए-नए आते रहते हैं पर मुझे वे विषय अधिक आकर्षित करते हैं जिनमें सत्य को, जीवन के किसी गहरे आदर्श को प्रतिष्ठापित करने का स्कोप हो। कहानियां वे ही चिरस्थाई होती हैं जो सत्य की आंच में पकी होती हैं। सत्य की आंच में कहानी की हांडी रखते ही सरस्वती दौड़ी चली आती है। तब शब्द स्वतः संवेदनाओं से लबरेज हो उठते हैं एवं जैसा कि तुलसी कहते हैं ’अरथ अमित अति आखर थोरे ’ वाली कहानियों का प्रादुर्भाव होता है। पाठकों के कर्णपट ऐसी कहानियों के लिए सदैव खुले रहते हैं। पाठको की इसीलिए मुझे कभी कमी नहीं रही।

प्रश्न 9: आप कहानियों में रामायण-महाभारत, पुराणों व आध्यात्मिक संदर्भो को आलेखों व कहानियों में  बखूबी काम लेते हैं, यह कैसे संभव हुआ ?
उत्तर: मैंने रामचरित मानस, महाभारत, गीता एवं वेद-पुराणों से संबंध अनेक ग्रंथ पढ़े हैं। यह सभी पुस्तकें बचपन में हमारी दुकान पर बिकती थी। घर में भी इन पुस्तकों को पढ़ने का प्रचलन था। माँ बहुधा संत-महात्माओं के व्याख्यान सुनने जाती थी, मुझे भी अनेक बार साथ लेकर जाती। यह बीज वहीं से अंकुरित हो गए। मानस तो मेरे लेखन का उत्स है। मेरे अनेक लेखों के शीर्षक में मैंने मानस की पंक्तियों का प्रयोग किया है। मैं ग्रन्थों को धीरे-धीरे सअर्थ पढ़ता हूँ। मुझे इन ग्रन्थों को पढ़ने में रस भी आता है। संभवतः इससे मेरा बीज संस्कार भी सिंचित होता है। भारतीय ग्रन्थ, पौराणिकता मानो मेरे रक्त में बहती है। मेरी अधिकांश कहानियां इसलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों के अर्क का विस्तार है या यूं कहूं इस अर्क को , इन ग्रन्थों के इत्र को कहानियों में ढालने का प्रयास है। यहाँ मै यह कहना प्रासंगिक समझूंगा कि कुरान, बाइबिल भी मैंने शिद्दत से पढ़ी हैं। सच कहूं तो कुरान पढ़ने के बाद मैं सगुन-निर्गुण का भेद सिरे से समझ पाया। मेरे भीतर तब बेहतर मनुष्य प्रगट हुआ, एक ऐसा मनुष्य जो सम्प्रदाय के आधार पर मानवी विभाजन नहीं करता, जो वैश्विक पीड़ा में समरस है। 

प्रश्न 10: क्या लेखन के कारण आपको व्यक्तिगत जीवन में कभी संघर्ष का सामना करना पड़ा ? कोई अविस्मरणीय घटना ?
उत्तर: दिनांक 25.10.2015 राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित मेरी कहानी ‘चोट’ ने व्यक्तिगत रूप से मुझ पर भी गहरी चोट की। इस कहानी में एक ब्राह्मण पात्र ‘ जगदीश मेनारिया ’ नित्य शराब पीता है एवं उसका बच्चा कुछ ऐसा करता है जिसकी ‘ चोट ’ के पश्चात् वह शराब छोड़ देता है। इस कहानी को पढ़कर देश भर के मेनारिया समाज ने गहरा विरोध, प्रदर्शन किया। मेरी गिरफ्तारी की मांग हुई, उदयपुर में इस समाज ने जिलाधीश के कार्यालय तक जुलूस निकाला, पुतले तक जलाये गये। बाद में मेरे एवं पत्रिका के समझाने के पश्चात् एवं स्थानीय साहित्यकारों के प्रतिविरोध एवं लामबंदी से मामला ठंडा पड़ा। इस दरम्यान मेरे घर तक को जलाने के प्रयास हुए। कहानी, स्तम्भ-लेखन को लेकर अनेक बार निकटस्थ रिश्तेदारों ने कहा, महाजन हो महाजनी करो, यह क्या बिना कमाई का काम पकड़ लिया ? मैं इन सबसे कभी हतोत्साहित नहीं हुआ। लेखन मेरी प्राण ऊर्जा है, इसके बिना मैं असहज, अरेचित, घुटता हुआ महसूस करता हूं। 


प्रश्न 11: आजकल आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता परोसने वाले अपने को युग के अनुरूप समर्थ रचनाकार समझते हैं, इस बारे में आपके विचार ?
उत्तर: मनुष्य का अवचेतन मन एक बड़ी गुफा के रहस्यों की तरह है। हमारी दमित विशेषतः यौनिक इच्छाएं यही घर बनाती हैं। यह दमित इच्छाएं हमारे दैनन्दिनी व्यवहार को प्रभावित भी करती हैं। कहानी हमारी सुप्त इच्छाओं को प्रगट करे किंतु शालीनता से। अश्लीलता एवं श्लीलता में यहीं अंतर है। कहानी में रोमांटिसिज्म हो मगर शालीनता की सीमा न लांघे, शब्दों का भौंडापन ना हो। कालिदास ने मेघदूत, कुमारसम्भव, अभिज्ञानशाकुंलतम के यौन दृश्यों, हास-परिहास, पात्रों के वार्तालाप आदि में इस रोमांटिसिज्म का खुलकर प्रयोग किया है। अन्य अनेक लेखकों जैसे भर्तृहरि ने भी अपने नीतिशतक में ऐसे प्रयोग किए हैं पर इनका लेखन कहीं से अश्लील नहीं है। मैंने भी मेरी अनेक कहानियों यथा मनुहार, मिहिर-मेघा, पहली बरसात, एक और सुहागरात, अतिक्रमण, उसकी बीवी आदि में इस रोमांटिसिज्म का खुलकर प्रयोग किया। पर मुझ पर ऐसी कोई तोहमत नहीं लगी। आजकल अनेक महत्वाकांक्षी लेखक रातों रात प्रसिद्ध होने के लिए अश्लीलता का दामन थामते हैं पर बरसात की बिजली की तरह वे उतने ही तेजी से विलुप्त भी हो जाते हैं। नीयत में सत्य की उपस्थिति आवश्यक है। 

प्रश्न 12: क्या रचनाकार के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता का होना आप जरूरी मानते हैं ? यदि हां तो क्यों ?
उत्तर: कहानियां हैं क्या ? कथाकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विचार ही तो हैं। लेखक की वैचारिकता से कहानियां निश्चय ही प्रभावित होती हैं। कहानियां लेकिन विचारधारा के अतिरिक्त भी उत्पन्न होती हैं। कहानियां समय का वलवला है, परिवेश से उपजा तूफान है, किसी घटना विशेष का वर्तुल, वाइब्रेशन भी है। अनेक कहानियां विशेषतः वे कहानियां जो जीवन के सार्वभौम सत्य से जुड़ी होती हैं, मात्र वैचारिकता नहीं होती। वे उससे कहीं आगे होती हैं। मण्टो की ‘टोबा टेकसिंह’ सुदर्शन की ‘हार की जीत’ प्रेमचन्द की ‘सद्गति’, ‘नमक का दारोगा’ समय और सत्य के हस्ताक्षर हैं। एक अच्छा लेखक कहानी पर अपनी वैचारिकता हावी नहीं होने देता तथापि न्यूनाधिक रूप से उसकी वैचारिकता कहानियों से प्रगट होती भी है। 

प्रश्न 13: आप काफी होमवर्क करने के बाद कहानी लिखते हैं या एक विचार, बिंदु ही आगे बढ़ता है ?
उत्तर: कहानी का कोई खास होमवर्क नहीं होता। कहानी जैसे कि मैंने ऊपर कहा चिंतन का एक वलवला है जिसका आगाज किसी अनुभव, घटना, विचार, बिंदु से ही होता है। समथिंग स्ट्राइक्स यू। कहानी इसी से उत्पन्न हुए चिंतन का विस्तार है। आप कह सकते हैं कहानी इसी बिंदु के सिंधु में समाहित होने की प्रक्रिया है, अभीप्सा है लोकविख्यात शायर नवाज देवबन्दी यहां प्रासंगिक हैं, अंजाम उसके हाथ है आगाज करके देख भीगे हुए पंखों से परवाज करके देख। कहानी संवेदनाओं से भीगे पंखों की उडान भर है। 

प्रश्न 14: कहानी के साथ-साथ और किस विधा (नाटक, उपन्यास, कविता) में लिखना आपको अच्छा लगता है ? 
उत्तर: कहानी एवं स्तंभ-लेखन मेरी प्रिय विधाएँ हैं एवं मैंने अब तक इन्हीं विधाओं में लिखा है। मेरी 143 कहानियां नौ कथा-संग्रहों में बद्ध है। करीब 500 आलेख महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठ पर छपे हैं। भविष्य में उपन्यास लिखने की भी मंशा है। कुछ लघु-कथाएं भी लिखी हैं। कतिपय कहानियों का अंग्रेजी, संस्कृत, राजस्थानी, पंजाबी, सिन्धी भाषा में अनुवाद भी हुआ है। 

प्रश्न 15: आप किन कथाकारों से अधिक प्रभावित रहे हैं ? 
उत्तर: वैसे तो मैं प्रेमचन्द, सुदर्शन, परसाई, अमृता प्रीतम, मण्टो, बंकिमचन्द्र चटर्जी, देवकीनन्दन खत्री, शरतचन्द्र, टैगोर आदि अनेक कथाकारों से प्रभावित हुआ हूं पर इनमें प्रेमचन्द सर्वोपरि हैं। प्रेमचन्द की कहानियां न सिर्फ सत्य का आईना है, वे तत्कालीन आडम्बरों, व्यवस्थाओं पर भी कड़ा प्रहार करती हैं। प्रेमचन्द साहित्य आपके अचेतन मन में पैठकर आपकी चेतना को समुन्नत करता है। इस नाते वे मात्र लेखक ही नहीं, एक बड़े समाज सुधारक भी हैं। इन वर्षों के कथाकारों में जैनेन्द्र, महाश्वेतादेवी, आशापूर्णादेवी, ज्ञानरंजन, विमल मित्र, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव एवं कतिपय अन्य कथाकारों को मैंने पढ़ा है। यह सभी कथा-विधा में नामचीं लेखक हैं। विदेशी कथाकारों में ओ हेनरी, मोपासा, डोस्टोवस्की, पर्ल एस बक का कथा-कौशल देखते बनता है। 

प्रश्न 16: रूस और फ्रांस की क्रांति के समान ही आज की बदलती हुई परिस्थितियों में लेखन द्वारा सामाजिक, वैचारिक और क्रांतिकारी परिवर्तन संभव है ?
उत्तर: एक अंग्रेजी कहावत है ‘ वेन द पेन मूवज् मेन मूवज्’ अर्थात् पेन से उपजे विचार मनुष्य के विचारों को गति देते हैं। कलम इसीलिये तो तलवार से अधिक शक्तिशाली है। रूस की क्रांति के नेपथ्य में गोर्की आदि लेखक ही थे। कबीरा खड़ा बाजार में लिये लुकाटि हाथ......... इसी सत्य का उद्घोष है। हमारे देश में ही नहीं दुनिया भर में वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक क्रान्ति का सूत्रपात लेखकों ने किया है। लेखक एक विचार का आग़ाज़ कर क्रान्ति का इंजन बनता है, लोक डिब्बों की तरह स्वतः उसके पीछे जुड़ जाता है। मात्र वैचारिक क्रान्ति ही नहीं लेखक अपनी रचना में अन्तर्निहित संदेशों द्वारा सत्य एवं इसके सार्वभौम सिद्धान्तों का भी प्रणेता बनता है। यह ठीक ऐसी ही बात है जैसे कोई अन्धेरे में चिराग जलाता है। दुष्यन्त, प्रेमचन्द, खलील जिब्रान वैचारिक, सामाजिक क्रान्ति के पुरोधा नहीं तो और क्या थे ? 

प्रश्न 17:रचनाकार के लिए सामाजिक दायित्व का बोध बहुत जरूरी माना जाता है। साम्प्रदायिक दंगों की इस आग को बुझाने में लेखक को अपनी भूमिका किस रूप में अदा करनी चाहिए ?
उत्तर: लेखक इंसानियत का चिराग है। मनुष्यता उसके लिए सर्वोपरि है। मेरा स्पष्ट मत है कि   साम्प्रदायिकता की बात करने वाला अथवा इस कुत्सित विचार को प्रशस्त करने वाला सच्चा कलमकार हो ही नहीं सकता। ऐसा लेखक मात्र अपने मन की भड़ास निकालता है। जो उसकी हाण्डी में है, वो उसे ही परोसता है। लेखक ‘साहिर’ होता है जो लिखता है ‘मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया हमने उसे हिन्दु औ मुसलमान बनाया........ मालिक ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया’, लेखक सम्प्रदाय को तोड़ता है, परिधियों को तोड़ता है, लेखक मनुष्य के स्वतंत्रचेता होने का आगा़ज है, लेखक आसमान का अनन्त छोर है, वह क्षुद्र सीमाओं में कैसे रह सकता है ? साम्प्रदायिक दंगों की आग बुझाने में ‘अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम ’ ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा’ ‘प्यार बांटते चलो’ ‘चले जा चले जा चले जा जहां प्यार मिले’ एवं अन्य अनेक ऐसे ही गीतों ने अहम् भूमिका निभाई है। अनेक कहानियों ने भी दंगों की आग बुझाने में पानी का कार्य किया है। भीष्म साहनी का लोकविख्यात उपन्यास ‘तमस’ एवं कहानी ‘मलबे का मालिक’ एवं अन्य ऐसी कथाएं हैं जिससे दंगों की आग का शमन हुआ। कथा-उपन्यासों एवं इनसे उपजी संवेदना ने साम्प्रदायिक दंगों की आग में फुहार का काम किया। 

प्रश्न 18: कहानी की आलोचना पर अपने विचार बताइए ?
उत्तर: आलोचक निष्पक्ष, सकारात्मक हो तो निःसन्देह लेखक को बेहतर लिखने के लिये प्रेरित करता है लेकिन बहुधा यह देखा गया है कि आलोचक एक विशिष्ट समूह के हितों अथवा विचित्र पूर्वाग्रहों से भी जुड़ा होता है। अनेक आलोचक सामान्य लेखकों की रचनाओं को बहुत बड़े लेखकों से तुलना कर उन्हें अकारण हतोत्साहित करते हैं। एक नवोदित लेखक एक स्थापित लोकमान्य लेखक नहीं हो सकता। कुछ अन्य आलोचक अपनी वैयक्तिक विचारधारा लेखक पर थोपने का प्रयास करते हैं। लेखक को आलोचक से ‘सार सार को गहि रहै थोथा देहि उड़ाय’ की तर्ज पर मात्र आवश्यक तथ्य ग्रहण कर लेने चाहिए। आलोचक लेखक को इस तरह से उसकी कमियां बतायें कि लेखक को बेहतर लिखने की प्रेरणा मिले। लेखक आलोचकों के इर्दगिर्द न घूमें, आलोचक से कहीं अधिक रचना की गुणवत्ता उसे सिद्ध करेगी। मुझे एक और नीति-कथा का स्मरण हो आया है। एक सेंटिपेड यानि सौ पैर का कीड़ा बारिश के बाद अपनी मस्ती में एक जंगल से गुजर रहा था। उधर चलते एक आदमी ने उसे कौतुक से देखा। कभी वह एक ओर से पैंसठ कदम उठाता तो दूसरी ओर से पैंतीस, कभी साठ-चालीस, कभी तैरासी-सत्रह। आश्चर्यचकित आदमी ने उससे पूछा, ऐ सेंटिपेड ! तुम इतना सुंदर, सटीक तालमेल कैसे बिठा लेते हो ? सेंटिपेड पलभर रुका, विस्मय से आदमी की ओर देखा और कहा ‘ऐसा तो मैंने कभी सोचा तक नहीं, मैं तो नित्य अपनी मस्ती में यूं ही चलता रहता हूं, कभी गिनकर पांव उठाये ही नही, फिर भी आप कहते हैं तो आज इसकी प्रक्रिया जानने का प्रयास करता हूं। सेंटिपेड ने इस बार प्रयास किया तो गणित बिगड़ गयी, वह चूक गया एवं गिर पड़ा। अब उसे माजरा समझ आया। वह  उठकर क्रोध में बोला ‘ऐ आदमी ! कभी किसी सेंटिपेड से उसके चाल की गणित, मस्ती का राज मत पूछना।’ यही स्थिति आज आलोचना की है। लेखक को लिखने दीजिये, उसे प्रोत्साहित करिये, उसे कहानी, कविता, इसकी वैज्ञानिकता आदि पैरामीटर्स में अधिक न उलझायें अन्यथा सेंटिपेड की तरह वह भी अपनी स्वाभाविक मस्ती खोकर गिर पडे़ेगा। 

प्रश्न 19:अब तक छपी कहानियों में कौन सी कहानी आपको अधिक प्रिय है और क्यों ?
उत्तर: इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व मुझे एक नीति-कथा याद आती है। अग्निदेव जब खाण्डव वन को जला रहे थे तब उसी वन के एक वृक्ष पर सारंग पक्षियों की एक माता चार शिशुओं के साथ अपने घौंसले में बैठी थी। चारों शिशु पक्षी अभी अबोध थे। अग्नि की लपटें वृक्ष की ओर आते देख वह मां असमंजस में पड़ गई। वह किसी एक शिशु को लेकर उड़ सकती थी लेकिन तीन शिशुओं को छोड़ना उसके वश में नहीं था। वह बार-बार उन कोमल शिशुओं की ओर देखती एवं आर्त स्वर में विलाप कर उठती। एक को बचाने के लिये तीन की बलि देना उसे कतई गवारा न था। किसी एक कहानी के चयन में लेखक की स्थिति उस शिशु-माता जैसी ही है। लेखक की हर रचना, हर कहानी उसकी आत्मजा होती है एवं अपनी ही अनेक कहानियों मे से एक कहानी का चुनाव दुष्कर कार्य है। लेखक का अपनी रचनाओं के प्रति मोह , पूर्वाग्रह लाज़मी है तथापि मुझे अब तक लिखी 150 कहानियों में ’पिशाच’ अधिक प्रिय है क्योंकि यह कहानी जीवन के किसी सार्वभौम सत्य को उद्घाटित करती है। 


प्रश्न 20: आज पुस्तकों के पाठक कम होते जा रहे हैं, ऐसे में आपके मन में कभी यह नही आता कि क्यों लिखा जाए ?
उत्तर: साहित्यिक जगत में आज यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि साहित्य के पाठक उत्तरोत्तर कम क्यों होते जा रहे हैं ? मैं इसके लिए पाठकों को दोषी नहीं मानता हालांकि हमारे समाज ने पाठकों की इस विरक्ति की भारी कीमत अदा की है। हम पाठकों के अवचेतन मन में सुंदर आचार-विचार-व्यवहार की ऐसी परत बनाने में असफल रहे जो सभ्य समाज का कवच थी। समाज में बढ़ते अनाचार का यह मुख्य कारण है। जब हमारी कहानियां मनोवैज्ञानिक कुंठाओं से भरी है, उबाऊ-नीरस हैं, रसविहीन हैं, सत्य से विमुख हैं तो पाठक उन्हें क्यों पढ़ेंगे और पढ़ेंगे तो वैसे ही तो बनेंगे ? कहानी का रसमय, सत्यसिक्त होना इसलिए कहानी की पहली शर्त है। कहानी में कथारस ही नहीं है, सत्य की गूंज नहीं है तो उसका उद्देश्य से भटकना स्वाभाविक है। सौभाग्य से मुझे कहानी के खूब पाठक मिले। सच कहूं तो पाठकों ने , लोक ने ही मेरी कहानियों को परवान चढाया अतः मैं क्यों लिखूं जैसा प्रश्न ही मेरे मन में नहीं आया। लिखते हुए मैंने स्वान्तः सुखाय का आनंद लिया एवं प्रकाशन पश्चात् पाठकों की प्रतिक्रियाओं ने मेरा उत्साहवर्धन किया। ई-जगत में, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में अच्छी कहानियों की खूब मांग है। आप ईमेल से भेजिए कहानी अच्छी हो तो बिना किसी अनुशंसा के प्रकाशित हो जाती है। लोक फिर स्वतः अच्छे कहानीकार को पहचान लेता है। 

प्रश्न 21:कहानी की भाषा के संबंध में अपने विचार बताइए ?
उत्तर: कहानीकार सरल, जनग्राह्य भाषा में कहानी कहे तो कहानी जीवन्त हो उठती है। ‘सहितस्य स साहित्य’ कहानी वह है जो नदी की तरह सब का हित करे और इसके लिये जरूरी है कि कहानी में लोकोक्तियों, मुहावरों एवं आवश्यकतानुसार लोकभाषा का भी प्रयोग हो। लेखक यथासंभव बोझिल, मनोवैज्ञानिक पेचिदगियों से संयुक्त शब्दावलियों से बचे। कहानी की जन स्वीकार्यता कहानी की सबसे आवश्यक शर्त है। विद्वानों की सभा में प्रशंसित होने से कहीं अधिक कहानी में लोक स्वीकार्यता जरूरी है। यह अहम तत्व कहानी का प्राण है। कहानी सबकी कहानी हो। आखिर आप लिख किसके लिये रहे हैं ? आपका अन्तिम भोक्ता कौन है ? जन आवाज खुदा का नक्कारा है। 

प्रश्न 22:नये कहानीकारों की कुछ उल्लेखनीय कहानियों के साथ कथाकारों के नाम भी बताइए अपनी दृष्टि से।  
उत्तर: नये कथाकारों में कमलेश्वर, मृदुला सिन्हा, मन्नु भण्डारी, राजेन्द्र यादव, उदय प्रकाश, इन्दिरा दागी, चित्रा मुद्गल, रविन्द्र कालिया, रघुनन्दन त्रिवेदी आदि की अनेक कहानियां मैंने पढी हैं, यह सभी बडे़ कथाकार हैं पर मैं प्रेमचन्द, मण्टो, ओ हेनरी आदि से अधिक प्रभावित हुआ हूं। 

प्रश्न 23: आज बडे कहलाने वाले साहित्यकार पुरुस्कार के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते देखे जाते हैं, इस बारे में आपको क्या कहना है ?
उत्तर: पुरुस्कार प्रोत्साहित करते हैं, प्रतिष्ठित करते हैं, यह एक कटु सत्य है पर लेखक दोनों कार्य कैसे कर सकता है यानि अच्छा लिखे भी और पुरस्कारों के लिए दौड़-धूप भी करे ? यह अकादमियों का कार्य है कि वे अच्छे समीक्षकों-पाठकों की टीम तेयार करे जो समय - समय पर उन्हें अच्छे लेखकों से अवगत करवाएं । अकादमियां इन्हें घर जाकर पुरूस्कृत करे। अभी तो आलम यह है कि पुरुस्कार के लिए आवेदन करते ही अनेक साहित्यकार लाॅबिंग कर इन्हें प्राप्त करने में लग जाते हैं।  मैं ऐसे अनेक साहित्यकारों को जानता हूं, जिन्हें कोई नहीं पढ़ता, वे मात्र पुरस्कारों की वजह से जाने गए हैं। गलत पुरुस्कार साहित्य की भारी हानि करते हैं। इससे पुरस्कृत पुस्तकों को पढ़कर लोक तो रूष्ट एवं भ्रष्ट होता ही है, अच्छे साहित्यकार भी हतोत्साहित होते हैं। गलत पुरुस्कार दोधारी तलवार की तरह समाज को आक्रांत करता है। आज अनेक अच्छे लेखक इन गलत पुरुस्कार प्राप्त लेखकों के पांव तले दबे गए हैं। मेरे मत में एक सच्चे सरस्वती के साधक को जितना हो सके इससे दूर रहना चाहिए। वह अपनी ऊर्जा उत्कृष्ट सृजन में लगाए, देर-सवेर सबको कर्मों का फल मिल ही जाता है।