कालीगढ़ के ठाकुर बृजेन्द्र सिंह न सिर्फ एक कुशल प्रशासक थे, अपने इलाके में लोकप्रिय भी थे। उनका रुतबा अपने इलाके में ही नहीं, आस-पास के गांवों तक फैला था। चांदी की मूठ लगी लकड़ी हाथ में लिए…
कौल
जाने क्यों पापा इन दिनों अंधेरे में बैठे रहते हैं ? मौका मिलते ही वे घर के दाँये कोने में बने कमरे में चले जाते हैं। इस कमरे में बिना ट्यूब घुप्प अंधेरा रहता है। वहां जाकर कमर…
तस्वीर
किसी दिवंगत व्यक्ति की तस्वीर देखकर कैसा लगता है ? और अगर वह व्यक्ति आपका अंतरंग हो तो ? इस कमरे में खड़े होकर प्रद्युम्न की तस्वीर को देखना मानो उस सम्पूर्ण इतिहास को उलटने जैसा है जिसे…
बहू-बेटी
प्रिय बहू, सदा सुखी रहो ! सर्वप्रथम मैं मेरे पुत्र से तुम्हारी सगाई होने के उपलक्ष में तुम्हें बधाई देता हूँ। हमारे मित्र-रिश्तेदारों से भी हमें इन दिनों निरन्तर बधाइयाँ मिल रही हैं। घर-परिवार सभी के मन इन…
चिड़ी का बाप
दिन अस्त हुआ तो दिवाकर ने दीर्घायु वृद्ध की तरह अनुभवों की गठरी अपने कंधे पर लादी एवं चुपचाप अस्ताचल में उतर गए। जाते-जाते पहाड़ी के उस पार हवाओं से आंख चुराकर निशिनाथ के कान में उन्होंने जाने…
गूंगे देव
अनुभा एवं राहुल के प्रणय प्रसंगों की कानाफूसियां अब परवान चढ़ने लगी थी। अनुभा के परिवार वाले इस तथ्य से परिचित थे लेकिन यह सोचकर आश्वस्त थे कि दोनों ने जब परिणय-सूत्र में बंधने का निर्णय ले लिया…
पाँव की जूती
थानेदार कालीसिंह की क्रूरता के किस्से थाने में ही नहीं, उनके मोहल्ले में भी मशहूर थे। ऐसा क्रूर व्यक्ति शायद ही देखने को मिले। जो मुजरिम उनके हत्थे चढ़ता तौबा कर उठता। अपनी वाणी से ही नहीं लात-घूंसों…
चिह्न
पचपन पूरे होने को आए, भगवान झूठ ना बुलवाए, आज भी मैं उतना ही डरता हूँ जितना बचपन में डरता था। भूत-प्रेतों का प्रसंग चल पड़े अथवा ऐसे विषयों पर चर्चा से अब भी रोंगटे खड़े हो जाते…
सोने की चिड़िया
दुनिया में सब कुछ मनुष्य के अनुकूल होता तो वह भगवान होता। अनुभव तो यही बताता है कि मनुष्य सोचता कुछ है एवं होता कुछ और है। राधेश्यामजी ने सोचा था कि बंटवारा करके वे चैन से जिएंगे,…
एक बिंदास लड़की
प्रो. काला को काॅलेज में पढ़ाते हुए पच्चीस वर्ष पूरे होने को आए, अनेक विद्यार्थी उनकी आंखों के आगे होकर निकल गए, जीनियस-मिडियोकर-ढोंपू सभी प्रकार के, अधिकांश को वे भूल भी गए, लेकिन कुछ नाम जो उनके जेहन…
बोनस
सूर्य उदयाचल से ऊपर उठे एवं धूप दीवारों पर उतरने लगी तब तक मैं नहा धोकर तैयार था। बसंत की सुबह कितनी मनभावन होती है। शीतल सुखदायिनी वायु एवं झूमते वृक्ष हृदय को आनंद से सराबोर कर देते…
नेति-नेति
उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट पर बैठे चार भूत आपस में बतिया रहे थे। गहन अंधेरी रात्रि का एक प्रहर बीत चुका था। कोई एक बजा होगा। दिसम्बर मासांत की कड़कड़ाती सर्दी में हवाओं की सांय-सांय…