पड़ाव

रात अब चढ़ने लगी थी। डाॅ. भारद्वाज ने सोने से पूर्व उड़ती-उड़ती निगाह बैठक की दीवार पर लगी क्लाॅक पर डाली। पौने ग्यारह बजे थे। उन्होंने एक गहरी श्वास ली एवं सीढ़ियाँ चढ़कर प्रथम तल पर स्थित बेडरूम…

नेह-नीड़

दस वर्ष बाद पुनः अपने घर आया हूँ। इस घर का कौन-सा ऐसा पत्थर, कौन-सी ऐसी वनस्पति, कौन-सी ऐसी वस्तु है जिसे भला मैं नहीं पहचानता। इस  प्रेमालय का चप्पा-चप्पा मेरी मोहब्बत की महक से भरा है। समय…

एक दिन अचानक

डूबते हुए सूर्य की अंतिम प्रकाश-रेखा का कण्ठहार संध्या ने पहना ही था कि साँझ का तारा उसकी नाक पर हीरे की लौंग की मानिंद चमकने लगा। सिंदूरी साड़ी का पल्लू सर पर लेकर उसने काली पलकें उठायी…

अदृश्य हाथ

दुनिया की ज़ुबान भला कौन पकड़ सकता है ? यहाँ जितने मुँह उतनी बातें हैं।  फैक्ट्री के मुलाजिम एवं मजदूर इन दिनों जहां मिलते, एक ही बात करते, ‘‘आखिर सेठ हरनारायण को हो क्या गया है ? कल…

एक और सुहागरात

मुुम्बई-त्रिवेंद्रम एक्स्प्रेस  रात के घने अंधकार को चीरती हुई तेजी से भागी जा रही थी। ट्रैन करीब एक घण्टा पूर्व मुम्बई से रवाना हुई थी। सभी यात्री अब तक व्यवस्थित हो चुके थे। कुछ सोने की तैयारी कर…

आश-पाश

नित्य की तरह परमात्मा आज पुनः वैकुण्ठ में आया एवं वहाँ रखे रत्नजड़ित स्वर्ण सिंहासन पर आसीन हो गया। स्वर्ण सिंहासन की चमक अब परमात्मा की दिव्य प्रभा के आगे फीकी लगने लगी थी।  परमात्मा अब तक अपने…

समदर्शी

सूरज-चाँद परमात्मा की दो आँखें हैं फिर वह दिन में मात्र सूरज की एवं रात को चन्द्रमा की एक आँख से ही क्यों देखता है? क्या दो आँखों से देखना उसे सुहाता नहीं, अथवा ऐसा तो नहीं कि…

विधान

राजा सूर्य रातरानी का आलिंगन छुड़ाकर जाने लगे तो अलसाई रातरानी ने उन्हें हाथ पकड़कर रोक लिया। मस्तक घुमाकर काले लंबे बालों को पीठ पर डालते हुए उसने रोष भरी आँखों से सूर्य को निहारा, फिर बोली, ‘‘देव!…

कद्र

चन्द्रशेखर ऑफिस पहुँचे तब तक दिन चढ़ चुका था। गरमी में दिन चढ़ते देर क्या लगती है। अपने केबिन में आकर उन्होंने वाॅलक्लोक पर उड़ती नजर डाली। साढ़े ग्यारह बजे थे। कुर्सी पर बैठने के पूर्व उन्होंने टाई…

सेवा

मि. कक्कड़ की व्यथा वे ही जानते थे। पिता की सेवा करते-करते शारीरिक तथा मानसिक दोनों स्तर पर वे टूट चुके थे। उनकी पत्नी सुरेखा की आंतें भी श्वसुर की तीमारदारी करते गले में आ चुकी थी। मि.…

आरोह-अवरोह

शहर के आयकर कार्यालय के बाहर एवं अंदर हंगामा मचा हुआ था।  जितने मुँह, उतनी बातें। जो सुनता, भौंचक्का रह जाता। लोगों को अपने कानों पर विश्वास नहीं होता। हो सकता है खबर गलत हो, यह भी हो…

माटी के दीये

उस जगह को अस्पताल कहना गलत होगा। जिन कमरों से खिड़की खोलते ही कल-कल बहती गंगा मैया के दर्शन होते हैं, दूर तक फैला मैदान, पहाड़ एवं झूमते हुए पेड़ दिखते हों वह अस्पताल क्योंकर होगा। उसे रिसोर्ट…