पकवान भरी थाली कमला ने छत की मुंडेर पर रखकर उसी गीत के साथ कौओं का आह्वान किया जो कभी उसकी सास ‘सावित्री’ अपनी सास के श्राद्ध दिवस पर गाया करती थी। जग दिखावे के लिए क्या-क्या नहीं…
हवेलियाँ
विदेशी सैलानियों से भरी वातानुकूलित लक्ज़री बस ’सम’ गाँव की ओर भागी जा रही थी। ‘डेविड स्मिथ’ दूसरी कतार में दायें खिड़की के पास बैठा मीलों पसरे रेगिस्तान को निहार रहा था। चारों और मिट्टी का समुद्र फैला…
तृप्ति
आकाश का पूर्वी छोर प्रभात की नवरश्मियों से रंजित हो चुका था। कलियों ने सूर्यदेव के दर्शन हेतु घूंघट उठाए तो नवकिरणों का स्पर्श पाकर उनके चेहरे पर बिखरी बूंदें कुदरत के मोतियों की तरह चमक उठी। गर्मी…
कच्ची धूप
आज सुबह वह फिर मेरे साथ था। माॅर्निंग वाॅक के आनन्द से वह अनभिज्ञ नहीं था। कालीन की तरह बिछी नरम मुलायम घास पर नंगे पाँव चलना, चहकती चिड़ियों को देखना एवं खुशबू चुराती हवा के आनन्द को…
शोध
रात नौ बजे होंगे। पार्टी अब जमने लगी थी। होटल ताज काॅन्टिनेन्टल के जगमगाते सेंट्रल हाॅल में प्रबुद्ध लोगों की भीड़ जमा थी। प्रोफेसर, डाॅक्टर, समाजशास्त्री एवं अन्य कई विद्वान पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। मिस शालिनी…
चिन्तामणि
दुनिया में दैविक चमत्कार होते रहते हैं। ऐसा ही एक चमत्कार रघुनाथ पाण्डे के साथ हुआ। अधेड़ उम्र का होते-होते इंसान भाग्य के कई पहलू स्वीकार कर लेता है। जीवन के थपेडे़ खाते-खाते एक नया ज्ञान उसकी आत्मा…
सत्यमेव जयते
साँझ कब की बीत चुकी थी। रात्रि की दुल्हन नवशृंगार कर अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में आँखें बिछाये खड़ी थी। तारों एवं नक्षत्रों से घिरा चतुर्दशी का युवक चन्द्र आसमान में यूँ बढ़ रहा था मानो कोई दूल्हा…
खुजली
उसकी शादी हुए दस वर्ष से ऊपर बीत गये। न जाने क्यूँ उसे अब जीवन नीरस, निरानंद लगने लगा था। कई बार तो वह कंटाल जाता। उसे याद है जब दस वर्ष पूर्व वह अनामिका को ब्याह कर…
दुआ
भले आदमी तो दुनियाँ में बहुत देखे, पर सूर्यनारायण बिस्सा जैसा शायद ही कोई होगा। उनकी दिनचर्या नियमित थी। रोज सुबह पाँच बजे उठ जाते, तैयार होकर सीधे ‘मोर्निंग वाॅक’ पर निकलते। सरपट घूमकर आधे घण्टे में वापस…
बेटियाँ
बहुत समय के बाद घर में उमंग और उत्सव के पल आये हैं। प्रेम किशोर करवा बाहर आँगन में आराम कुर्सी पर बैठे किसी गहरे चिंतन में डूबे थे। भोर की ठण्डी हवा उनके दार्शनिक मन को एक…
मनुहार
चाँद आसमान को दो-तिहाई से ऊपर पार कर थकी-सी जम्हाई ले रहा था। चांदनी की महीन चादर ओढ़े थार के टिब्बे मीलों पसरे पड़े थे। भोर का तारा अंधेरे दरवाजे के पीछे खड़ा बाहर निकलने का मौका तक…
आधार
‘चाय तैयार है !’ तारा की रसोईघर से आती आवाज को सुनकर सब डाइनिंग टेबल पर हाजिर थे। तारा का अनुशासन कठोर था, वह सिर्फ एक ही बार आवाज देती। बार-बार आवाज देना उसे जरा भी नहीं सुहाता।…