मैं श्री हरिप्रकाशजी राठी की अमृतदायिनी कहानियों को पढ़कर अभिभूत हूं। समय की रफ़्तार से सर्वथा हटकर एक नए अंदाज एवं फलसफे के साथ लिखी ये कहानियां आपको मंत्रमुग्ध कर देती हैं। आप इन्हें नहीं पढ़ते, ये आपको पढ़वाती हैं एवं यही कहानी की ताकत भी है। एक ऐसे समय में जबकि पाठक ढूंढे नहीं मिलते, ये कहानियां आपको चुंबक की तरह अपनी ओर खींचती हैं।
यह हैरान करने वाली बात है कि रुपये-पैसे की व्यावसायिक दुनियां से जुड़े श्री हरिप्रकाशजी राठी ने न सिर्फ ऐसी संवेदनशील, भावपूर्ण कहानियां लिखीं, मानवी प्रवृत्तियों का नीर-क्षीर विश्लेषण कर पाठकों को मनुष्य के उजले कोनों से भी परिचय करवाया। राठीजी मूलतः हर इंसान को सुंदर व अच्छा समझते हैं, उनके अनुसार हर इंसान अच्छा है बस उसके मन सरोवर में बिछी काई को हटाने भर की देर है। मैंने एवं श्रीमती पगारे दोनों ने राठीजी के प्रतिनिधि संग्रह ' उसकी बीवी एवं अन्य कहानियां ’ की 44 कहानियां पढ़ी हैं एवं उनके कथा-संग्रह पर हम दोनों का लगभग समान मत है। इन सभी कहानियों में भिन्न कथानक हैं एवं ये कहानियां बगीचे के बहुरंगी पक्षियों की तरह भिन्न व्यवहारों एवं उससे उपजे चिन्तन को रेखांकित करती हैं। राठीजी किसी लीक, पैटर्न अथवा विचारधारा में नहीं बंधते वरन हर कहानी एक नया कथानक, परिवेश, रोमांच एवं संदेश लिए हुए है। राठीजी की ये कहानियां मध्यमवर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, अधिकांशतः कथा नायक-नायिकाएँ इसी वर्ग से हैं एवं चूंकि राठीजी स्वयं इसी वर्ग से हैं, यह बात सिद्ध होती है कि राठीजी ने अपने आस-पास के किरदारों से जो भी देखा-भोगा, अनुभूत किया वही लिखा है। अनेक कहानियां तो समाप्त होते-होते पाठक को विह्वल कर देती हैं एवं ऐसा लगने लगता है मानो ये कहानियां हमारी अपनी कहानियां हैं। पाठक को कहानी अपनी-सी लगे, उसमें तिलमिलाहट, छटपटाहट पैदा करें, वह उसके साथ बहे एवं कहानी अंत होते उसके अवचेतन मन में एक महान संदेश रोपित कर दे, कहानी की इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती है। श्री राठीजी इस मायने में एक सफल कहानीकार सिद्ध हुए हैं।
संग्रह की पहली कहानी 'अमरूद का पेड़’ न केवल बहुचर्चित, बहुपठित एवं बहुप्रशंसित है एक सार्थक संदेश भी लिए हुए है। 'जो देना नहीं जानता उसे प्रकृति देती भी नहीं है’ जैसे महान संदेश को एक पेड़ के माध्यम से इतनी सरल, सुगाह्य भाषा में प्रस्तुत कर देना राठीजी की जादूगरी नहीं तो और क्या है ? सरल भाषा में ऐसी अर्थगर्भी कहानियां मिलती कहां है। ऐसे में राठीजी का पाठक-संसार इतना विशाल बन जाए तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है। यह कहानियां मानवी संवेदना का चरम है। पाठक इन कहानियों के भाव-वारिधि में गोते लगाते हैं। राठीजी 'अमरूद का पेड़’ कहानी में न सिर्फ अपने परिवार से, काॅलानी के बच्चों, पड़ोसियों यहां तक कि पशु-पक्षियों तक से प्यार करते हैं।, स्वांतःसुखाय को सर्वसुखाय में भी रूपांतरित करते हैं। राठीजी की इस कहानी में सोऽहं सोऽहं का नाद सुनाई देता है। कहानी की कसावट, प्रवाह देखते बनता है। मुझे यह कहानी संग्रह की सबसे उत्तम कहानी लगी। निश्चय ही यह कहानी वैश्विक स्तर की तो है ही, अविस्मरणीय भी है।
संग्रह की अन्य कहानियां भी मानव जीवन की विविधताओं एवं सच्चाइयों का आईना है। उनके कहानी कहने का ढंग अनूठा है। शब्द ही मानो कथा पात्र-पात्री के व्यक्तित्व, विचारों एवं व्यवहारों को प्रस्तुत करते हैं। राठीजी के पास शब्द, संवादों, लोकोक्तियों का खजाना है। वे पात्र-पात्रियों को ही नहीं, दृश्यों का भी सजीव चित्रण करते हैं। कहानियां चलचित्र की तरह आगे बढ़ती हैं। पाठक कथा, कथानक में एकमेक हो जाता है। पाठक का कहानी में समरस होना अच्छी रचना की पहली एवं अनिवार्य शर्त है एवं यह कार्य श्री राठी जैसा साहित्य का गहन अध्येता ही कर सकता है। ऐसा लगता है कि राठीजी सुपठित हैं, उन्होंने स्वदेशी साहित्य ही नहीं विदेशी साहित्य को भी खूब पढ़ा है, उनकी कहानियों का वैश्विक स्वरूप उसी से उभरा है। वे हर कहानी में जीवन के किसी गहरे सत्य से रूबरू करवाते हैं। यह सत्य मानो उन्होंने स्वयं घटते हुए देखा हो। लेखक अपने स्वाध्याय एवं अनुभव के आधार पर ही कथा एवं कथापात्र रचता है। कहानी लेखक से जुदा नहीं हो सकती। यहां ' एमिल जोला ’ का यह कथन प्रासंगिक है कि 'प्यार ही सब कुछ है एवं प्यार में ही सब कुछ है’ अर्थात् कथा-कथापात्र जब दूध में पानी की तरह मिल जाते हैं, कथा जीवंत हो उठती है।
कहानी 'भटकते आकाश ’ में नायिका सोनिया अपने पति को हृदय से चाहती है। वह उसके प्रेम में सराबोर है, यह प्रेम काॅलेज समय में पल्लवित हुआ है। पति की बेवफ़ाई जानने के पश्चात उसके मन-मस्तिष्क में भूचाल आता है एवं तद्नुसार उसका व्यवहार मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो वह 'रिबाउंड’ कर जाती है। इस कहानी के कई संवाद यथा -
'सूर्या ! इसके बाद मैंने संदीप को जवाब देने की ठान ली। औरत खूंटे से बंधी बकरी नहीं है ? सामाजिक रूढ़ियों के ये शूल स्त्री के लिए ही क्यों ? ’
'अगर अपनी शक्ति एवं धन का सहारा पाकर पुरुष बहुस्त्रीगामी हो सकता है तो स्त्री बहुपुरुषगामी क्यों नहीं हो सकती ? क्या द्रोपदी के पांच पति नहीं थे ? क्या वह स्त्री नहीं थीं ? हमारे ही धर्म ने उसे एक सम्मानित स्त्री का दर्जा दिया है, फिर सोनिया ऐसा क्यों नहीं कर सकती ? कुपथगामी होना क्या मात्र पुरुषों का अधिकार है ? ’
"संसार की सहानुभूति एवं सांत्वना पर जीने के लिए मेरा जन्म नहीं हुआ है। ’’
इस कहानी को 'एमिल जोला' की प्रेम संबंधी अभिव्यक्ति के समकक्ष रखा जा सकता है। इस कहानी में अन्य पात्रों का विश्लेषण भी अद्भुत है। कहीं-कहीं वाक्यांश कथारस में जान डालते हैं प्रेम के दिव्यस्वरूप को परिभाषित करते हुए राठीजी लिखते हैं , ' प्रेम जीवन का राग बसंत है। कितनी उर्जा, कितना उल्लास है इसमें। आत्मा के आकाश पर मानो सहस्त्रों सूर्य उग आए हों। कहानी ’ भटकते आकाश ’ बदलते परिवेश में नारी के बदलते तेवर की अभिव्यक्ति है। राठीजी ने इस अभिव्यक्ति की सफल सर्जना की है ।
राठीजी अपने अद्भुत शब्द प्रयोगों से कहानी के पात्रों, दृश्यों , संवादों को सजीव करते हैं। कहानी ' अक्कड-बक्कड ’ इसका उदाहरण है। एक बानगी प्रस्तुत है -
‘‘आओ बिट्टू , तुम्हें स्कूल छोड़ दूँ। आज बस छूट गई लगती है।’’ मैंने सांत्वना देते हुए कहा।
‘‘नहीं अंकलजी! मैंने खुद ही जान-बूझकर बस छोड़ दी है।’’
‘‘क्यों क्यों! तुमने ऐसा क्यों किया?’’ मैंने विस्मय से पूछा।
‘‘टीचर ने इतना होमवर्क दिया कि मैं पूरा नहीं कर पाया। आज स्कूल जाऊंगा तो पिट्टी हो जाएगी।’’
‘‘यह तो गलत बात है, मम्मी को पता चल गया तो।’’ एक अच्छे गार्जियन की तरह मैंने उससे सवाल किया।
‘‘कुछ पता नहीं चलता, ऐसा तो मैं कई बार कर चुका हूँं। जब भी होमवर्क पूरा नहीं होता मैं बस में नहीं चढ़ता। आज तक मम्मी को पता नहीं चला।" फिर जाने क्या सोचकर बोला, ‘‘अंकलजी, स्कूल से गोत मारकर मंदिर में बैठना मुझे बहुत अच्छा लगता है। दोपहर तक आस-पास के बच्चे भी आ जाते हैं। हम दिन भर खेलते हैं, मंदिर से प्रसाद भी लेते रहते हैं।’’ इस बार बिना किसी भय के वह सारी बात कह गया।
मैं कुछ उत्तर देता उसके पहले ही वह खिलखिलाकर हँस पड़ा। उसकी हँसी में अपराध-बोध , शौर्य-दर्प दोनों साथ-साथ झलक रहे थे।
मैंने मन-ही-मन उसके साहस के लिए उसे धन्यवाद दिया। स्ट्रेस मैनेजमेन्ट का कितना प्रभावी तरीका था उसके पास। एक मैं हूँ जो चार दिन से बगलें झाँक रहा हूँ। कोई उपाय ही नहीं निकल रहा। साँप-छछूंदर की तरह बीवी को कहने-ना कहने में ही प्राण निकले जा रहे हैं। चार दिन से भूख है न प्यास, सो भी नहीं पाया।
यकायक मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा। क्यूं न एक दिन के लिए मैं भी बिट्टू बन जाऊँ। बच्चे सदैव प्रसन्न एवं प्रफुल्लित नजर आते हैं। बड़े होने के साथ-साथ हमने मन पर कितने पाप चढ़ा लिये हैं, ऐसे में हमारे तनाव कैसे मिटेंगे?
उपरोक्त अंशों में अद्भुत दृष्यात्मकता उभरती है।
श्री हरिप्रकाश मूलतः जोधपुर , राजस्थान के हैं, इसीलिए उनकी कहानियों में राजस्थानी लोकोक्तियों की भरमार हैं। रेत में सर्प के निशान वहीं संभव है। ' गरीबी चली गई पर मन पर इसके निशान रेत पर से सर्प के निकल जाने की तरह अब भी शेष हैं ’ आदि-आदि। एक कहानी में लिखते हैं ' मन की रेत पर सांप रेंग गया’ राठीजी की अनेक कहानियां इसीलिए राजस्थानी संस्कृति, परिवेश का आईना लगती हैं।
श्री हरिप्रकाश राठी रोमांस के राजकुमार हैं। 'उसकी बीवी ’ कहानी में रसीली अंगुलियाँ , प्रणयातुर स्त्री का अंग-अंग वाचाल होता है , रूप की मदिरा आदि वाक्यांश कहानी को रसमय बनाते हैं। ये वाक्य, कथानक, चरित्र, वातावरण सभी को सजीव बनाते हैं। कहानी में एक दृश्यात्मकता साकार हो उठती है। एक बानगी देखिए-
'दिल मत दे देना, जान से मार दूंगी ..... । ’ स्त्री के पजेसिव वाक्य पुरुष की कामाग्नि में घी का कार्य करते हैं। मैं उसकी ओर यूं बढा जैसे वेग से समुद्र की ओर आती हुई नदी को स्वयं में समाहित करने से पूर्व समुद्र उसे लहरों का अधरदान देता है।
'अभी भी वक्षों में कैसा उभार है, कैसी उज्जवल हंसी है मानो सहस्त्रों जूही के फूल एक साथ बिखर गये हों। औरत का रूप पुरुष को कैसा उन्माद देता है। बुद्धिमान और बात-बात में तर्क करने वाली औरतें तो कागज के फूल जैसी लगती है। रूप की मदिरा से तृप्त होकर ही पुरुष के मन की स्त्री मर सकती है। जिनके खूबसूरत बीवियां नही होती वे मर्द सारी उम्र ताका-झांकी करते हैं।'
सौन्दर्य, लावण्य और आकर्षक चुंबकीय काया नारी की अमूल्य संपदा है लेकिन रूप में गुण का मेल न हो तो सब व्यर्थ हैं। यही स्थिति फिर आपके रूप , लावण्य का अवमूल्यन कर देते हैं। कहानी की नायिका रूपगर्विता है, आत्ममुग्धा है एवं इसी के चलते पति को तुच्छ समझती है। उसका यही रूप उसके पड़ोसी को आकर्षित करता है पर अंततः उसे समझ आ जाती है कि यहां ढोल की पोल है। गुण हो तभी रूप निखरता है एवं यही बात श्री राठी ने ' उसकी बीवी ’ कहानी में शिद्दत से समझाई है।
कहानी 'मिहिर-मेघा ’ में तो सूरज-बादल का प्रवाद रोमांटिसिज्म का चरम है। खूबसूरती यह भी कि सब कुछ लिखते हुए भी वे किंचित अश्लील नहीं लगते। इसी कहानी के ये अंश देखिए -
आषाढ़़ क्या लगा जड़-चेतन सभी मस्ती में बौरा गये।
भोर के घोड़ों को रथ में जोतकर सूरज ने उसे हांका ही था कि सामने घूमता हुआ एक आवारा बादल उसके मार्ग में आ गया। नाक भौं चढ़ाकर सूरज उसे छेड़ता हुआ-सा बोला, ‘‘अरे लंपट! सुबह-सुबह यूँ आवारों की तरह क्यूँ डोल रहा है?’’
‘‘ऐसा क्यूँ कहते हैं, सूर्यदेव! मैं आपको लंपट दिखाई देता हूँ?’’ बादल ने चिढ़कर उत्तर दिया।
‘‘मैंने क्या गलत कहा! आषाढ़ लगते ही तेरे भाव कुछ ज्यादा ही बढ़ जाते हैं। तू लंपट नहीं तो क्या है? जब देखो भू-कामिनी के शिखर स्तनों को चूम-चूम कर उसे उत्तेजित करता रहता है।’’ सूर्य ने ऊपर के दाँतों से निचला ओठ काटते हुए शरारत की।
‘‘आप कम हैं क्या! पहले तो आप ही तेज तप कर उसके हरीतिमा वस्त्रों को उतारते हैं। नग्न स्त्रियों को देखने की आपकी पुरानी आदत गयी नहीं। मैं तो उल्टे झीना श्वेत वस्त्र डालकर उसकी नग्नता को आवरण देता हूँ।’’
‘‘यह लो! अब शराफत तुम्हीं में रह गयी। तूने मुझे और कब नग्न स्त्रियों को छुप-छुप कर निहारते हुए देखा है?’’
‘‘मुँह अंधेरे जब विरहणियाँ अपने प्रवासी प्रेमियों की याद में अस्त-व्यस्त पड़ी उच्छ्वासें भरती हैं, तब क्या मैं किरणों की दूरबीन से उन्हें देखता हूँ? भोर के समय अपने पतियों के आलिंगन में लिपटी निर्वस्त्र नवब्याहताओं को सर्वप्रथम आप ही रोशनदानों से झाँककर देखते हैं।’’ बादल ने पलटवार किया।
‘‘तू कम है क्या! तू भी तो उपवनों में गीत गाती हुई हिरणाक्षियों पर बूंदें बरसाकर उन्हें भिगोता रहता है। तेरी बूंदों के मारे उनके पतले वस्त्र जब उनके बदन से चिपकते हैं तो क्या तू और तेज बरसकर उनके अंगों को नहीं निहारता? तब तो मैं वहाँ नहीं होता।’’ सूर्य ने नहले पर दहला दिया।
‘‘यह लो! उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। मेरे जाने के बाद जब वही हिरणाक्षियाँ पेड़ों की ओट में अपने वस्त्र सुखाती हैं तब क्या आप नेत्र बंद कर लेते हैं? तब आप ही तप-तप कर उन्हें कहते हैं, ‘‘हे कामिनियो ! आराम से अपने वस्त्र सुखा लो। अब आवारा बादल तो गया। उन बेचारियों को क्या पता कि आप जैसे अनुभवी बूढ़े युवा बादलों से भी अधिक लुच्चे होते हैं।’’ बादल कौनसा रुकने वाला था।
‘‘छोटे मुँह बड़ी बात मत कर! तू जो रात में चाँद के आगे आकर बार-बार चाँदनी का आलिंगन करता है, मैं क्या जानता नहीं ! मैं उस समय वहाँ नहीं होता हूँ तो क्या, सुबह चकोर-चकवे मुझे सारी हकीकत बयाँ कर देते हैं।’’ बादल के तर्कों से आहत सूरज अब गंभीर होने लगा था।
‘‘आप जो नित्य संध्या के लाल गालों को चूमकर उसे अंधेरे बिस्तर पर ले जाते हैं, वह क्या मुझसे छिपा है !’’ अपने तर्क की तलवार को बुद्धि की सान पर रगड़ते हुए बादल ने उत्तर दिया।
‘‘पहले अपने गिरेबान में झाँक! पावस में चपला दामिनी तेरे आलिंगन से छूटकर भागती है तब कैसे पागलों की तरह शोर मचाता है। अपनी बीवी तो सम्भलती नहीं, दूसरों को उपदेश देता हैं।’’ सूरज मूँछें तानकर बोला।
‘‘और चाँद जो आपकी संध्यारानी के पीछे लगा रहता है, उसका भान है आपको? अपनी फूटी दिखती नहीं, दूसरों की फूली निहारते रहते हो।’’ बादल से भी रहा नहीं गया।
इसी तरह कहानी ' पहली बरसात ’ का आग़ाज़ ही वे रोमाण्टिसिज्म से करते हैं। कहानी के वाक्यांश में पुरुष-प्रकृति का क्या अद्भुत प्रेम दर्शाया है। कहानी का प्रथम पैरा ही लीजिए -
आषाढ़ अभी लगा ही था। जेठ ने पूरे महीने तप कर सभी जीव जन्तुओं एवं वनस्पतियों को व्याकुल कर दिया। दिन भर सूर्य आँखें फाड़े आग उगलता। कामविकला स्त्री की तरह पृथ्वी का अग्नितत्त्व उसे यूँ जला रहा था मानो उसकी रचना पंचतत्त्वों से न होकर मात्र अग्नितत्त्व से हुई हो। तभी विकल धरती ने क्षितिज के उस पार आसमान के कान में जाने क्या फुसफुसाया कि आसमान दंभ से गरज उठा। आँखों में गांभीर्य भरकर उसने धरती की ओर ऐसे देखा मानो कह रहा हो, धीरज धर! ऐसा कभी हुआ है कि स्त्री निवेदन करे एवं पुरुष उसे न दे। देखते ही देखते असंख्य काले बादल आसमान की विशाल छाती पर तैरने लगे। बिजलियों के दाँतों से क्रूर अट्टाहास कर बादलों के लिंग से उसने वीर्यपात किया तो धरती की कली-कली खिल गयी। मूसलाधार स्खलन से धरती अघा गयी। तृप्त धरती ने कृतज्ञ आँखों से नभनाथ का आभार प्रकट किया तो गड़गड़ा कर उसने पृथ्वी को समझाया, ‘‘मेरे प्रेम के अंकुर जब हरे भरे फलों से लद जायें तो उन्हें अपने बच्चों में बाँट देना। विश्वास रखना! तू जब भी रीती होकर मुझे पुकारेगी, मैं पुनः तुम्हें प्रेमदान करने आऊंगा।’’
इसी कहानी के कुछ और अंश यथा -
'आषाढ़ की फुहार जड़-चेतन सभी के मन को उमंग से भरने लगी थी। पेड़ से बंधे गधे भी कुलेल करने लगे थे। दोनों में से एक गधी होती तो बेचारे मस्ता लेते पर फिलहाल कामजयी शिव को याद कर छाती कूट रहे थे। ’
'जड़-जानवरों की ऐसी दशा के चलते मनुष्य भी बौरा गया। रात बंद कमरों में उन्मत्त पुरुष कामिनियों की पुष्ट जंघाओं पर आघात करते तो बाहर पेड़ो पर बैठी कोयलें उनके मधुर दर्द में सुर मिलाकर कुहू-कुहू की ध्वनि करती। ’
कहानी 'पहली बरसात ’ सेक्स से सुपरकांससनेस ’ की अद्भुत , आनंददायी यात्रा है। इस कहानी में भी मुहावरों, लोकोक्तियों ने सोने पर सुहागे का कार्य किया है। कहानी के अतिम पैरे कितना संदेशगर्भा हैं -
'आषाढ़ फिर आया। रीती धरती ने फिर आसमान को पुकारा। आसमान ने अपना वादा पूरा किया। आषाढ़ की पहली बरसात बरसी तो नदियाँ फिर उमड़ पड़ी। नदियों के साथ-साथ ही कई छोटे-छोटे नाले कगारों को तोड़कर ऐसे उफन पड़े जैसे मूर्ख थोड़ा-सा धन पाकर बावले हो जाते हैं। जिनके कगारों में दम नहीं हो वो नाले कब तक टिकेंगे? बारिश रुकते ही उन्होंने भी दम तोड़ दिया। हाँ, पक्के जलाशय अवश्य पानी से भर गये थे एवं नदियाँ अपने मजबूत कगारों के बीच अब भी निश्छल बह रही थीं। पहली बरसात का फेन पीकर कई मछलियाँ बदहवास हो गयी थी, नया पानी पीकर मोर मोटे हो गये थे एवं कई मेंढकों ने दम तोड़ दिया था।
धन कमाने से भी ज्यादा जरूरी है धन को सहेजना। कमाने से ज्यादा पचाने में अकल चाहिए। हम सभी के जीवन में ऐसा समय आता है जब ईश्वर हमें जीवन बदलने का अवसर देता है। ऐश्वर्य एवं वैभव सभी के जीवन में दस्तक देते हैं लेकिन ठहरते वहीं है जो इन्हें पाकर मदांध नहीं होते। ईश्वर ऐश्वर्य देता है तो कसौटी पर भी कसता है। सयंमित एवं श्रमजीवी इसे उसकी नियामत मानकर अपने कैरियर की ईंटें रखते हैं, मूर्ख दिखावा करके धन का नाश कर देते हैं। ’
कहानी में ही उद्धृत ये संदेश ठीक उस समय आया है जब पाठक का अवचेतन मन चातक की तरह संदेश ग्रहण करने को व्याकुल था। इसीलिए यहां संदेश जरा नहीं अखरता वरन कहानी में जान डाल देता है। ऐसे प्रयोग हमारी पुरातन पौराणिक कहानियों में खूब हुए हैं एवं जैसा कि मैंने ऊपर लिखा कथाकार राठी बहुपठित हैं, उन्होंने लिखने के पहले खूब पढा है।
प्रकृति चित्रण भी राठी बखूबी करते हैं। कहानी ' धरोहर ’ के वाक्यांश -
'सूरज की पगड़ी सिर पर रखकर दिवस ने गंभीर आंखों से चारों ओर निहारा तो संपूर्ण जगत एक विचित्र भय से सिहर गया। ’
'पक्षी जब पेड़ो पर चहके एवं भौरों ने मधुपान प्रारंभ किया ......। ’
'आदमी अपने वजूद पर बढता है, जंगल में हजारों कमल अपने दम पर खिलते हैं सूरज का ताप अपने बूते पर प्राप्त करतें है। वे तुम्हारी तरह पुरखों के आगे हाथ नहीं पसारते।’
"जंगल के कमल भी जल के आधार पर खडे हैं पापा ! जिन कमलों के नीचे जल नहीं होता सूर्य उनको सहारा देने के बजाय जला देता है।’’
प्रकृति चित्रण , उपमानों एवं बिंबों के साथ बहती राठीजी की कहानियां सहज ही निखर उठती हैं। अंत में सारंगी को कबाड़ी से दूना मूल्य देकर लाना, श्याम का चाबियां मुट्ठी में कसना 'धरोहर’ का मूल्य उद्घाटित करता है।
संग्रह की एक और कहानी 'पिशाच’ में राठीजी जोधपुर के महाजन परिवारों पर करारा व्यंग्य करते हैं। यहां भी अनेक वाक्यांश मन मोह लेते हैं। हर कहानी में वे कोई न कोई संदेश रोपित करते हैं। उनकी सभी कहानियों को मनुष्य के चेतस उन्नयन की कथाएं कहा जा सकता है।
कहीं-कहीं राठीजी शब्दों के सही चयन से भी चूकते हैं जैसे सुंदर, रूपसी स्त्री को कृशांगी कहने की बजाय तन्वंगी कहना अधिक प्रासंगिक होता। ऐसी एक-दो गलतियां और भी हैं लेकिन राठीजी की कहानियों में प्रवाह, बहाव इतना रोचक है कि पाठक खुद समझ जाता है कि वे क्या कहना चाह रहे हैं तथापि इन्हें ऐसी त्रुटियों से बचना चाहिए।
कुल मिलाकर राठी की कहानियां सरस तो हैं ही संदेशग्राही भी हैं। इन कहानियों की गुणवत्ता ही नहीं, पाठकीय क्षमता भी अद्भुत हैं। एक बार संग्रह हाथ में लेकर आप इन कहानियों को छोड़ नहीं सकते। हिन्दी जगत को ऐसी भावप्रवण, पठनीय एवं संदेषग्राही कहानियां देने के लिए मैं उन्हें बधाई देता हूं। मैं उन्हें आज की पीढ़ी के सशक्त कथाकारों की अग्रिम पंक्ति में रखता हूं।
शरद पगारे
खण्डवा, मध्यप्रदेश में जन्मे, भोपाल में इतिहास के प्रोफेसर शरद पगारे उन चंद उपन्यासकारों में हैं जिनकी कृतियों का अनेकानेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। वे हिन्दी के वरिष्ठतम एतिहासिक उपन्यासकारों में एक हैं। वागीश्वरी पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान सहित अनेक दिग्गज सम्मानों से नवाजे श्री पगारे ने गुलारा बेगम ,गंधर्वसेन ,पाटलीपुत्र की साम्राज्ञी जैसे लोक प्रतिष्ठित उपन्यासों के अतिरिक्त अन्य कई उपन्यास , कहानियां आदि भी लिखे हैं।
आधुनिक हिंदी साहित्य में खड़ीबोली गद्य के विकास के पश्चात् हिंदी गद्य की जितनी भी प्रमुख विधाएँ(उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, यात्रावृत्तांत आदि) हैं, उनमें आज कहानी हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है, जहाँ नए-पुराने कहानीकारों की कमोबेश तीन-तीन पीढ़ियाँ कहानी लेखन की दिशा में सक्रिय हैं। आज के समकालीन दौर में कहानी लेखन की दृष्टि से जिन कुछ कहानीकारों ने तेज़ी से अपनी पहचान स्थापित की है, उनमें जोधपुर(राजस्थान) के कहानीकार हरिप्रकाश राठी का नाम उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है! हालाँकि साहित्य सर्जन की कोई क्षेत्रगत भौगोलिक सीमारेखा नहीं निर्धारित की जा सकती, पर हिंदी प्रदेशों में राजस्थान को हिंदी साहित्य के विस्तार और प्रसार के साथ रचनात्मकता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण कहा जाना चाहिए, जहां हिंदी की समृद्ध लेखन परंपरा रही है। राजस्थान में आज भी अनेक ऐसे रचनाकार हैं, जो साहित्य रचना में गंभीरता से सक्रिय हैं। ऐसे ही एक चर्चित रचनाकार (मूलतः कहानीकार) हरिप्रकाश राठी हैं, जो कमोबेश पिछले दो दशकों से कहानीलेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। हिंदी कहानीकार के रूप में हरिप्रकाश राठी ने जिस तरह अपनी पहचान स्थापित की है, उससे उनकी कहानियों की विश्वसनीयता प्रमाणित होती है। उनकी अनेक कहानियाँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं, हो रही हैं, जिससे उनका परिचय व्यापक पाठकवर्ग तक पहुँचा है और उन्होंने तेज़ी से अपनी पहचान स्थापित की है। कहना चाहिए कि हरिप्रकाश राठी एक ऐसे कहानीकार के रूप में जाने-पहचाने जाने लगे हैं, जिन्होंने राज्य-प्रांत की सीमाओं का अतिक्रमण कर राजस्थान से बाहर भी लोकप्रियता हासिल की है।
कहन के ऐतबार से कहानी का इतिहास भले ही बहुत पुराना है, पर हिंदी कहानी का लिखित इतिहास बहुत पुराना नहीं है। आधुनिक हिंदी साहित्य में बीसवीं शताब्दी के आरंभ से हिंदी कहानी अपना आकार ग्रहण करती है, जिसका कमोबेश सौ वर्षों में बहुत विस्तार हो चुका है। हिंदी कहानी की विकासयात्रा में जितने पड़ाव हैं, हिंदी कविता को छोड़कर उतने संभवतः अन्य किसी विधा में नहीं। कहानी, नई कहानी, साठोत्तरी कहानी, अकहानी, समांतर कहानी, सचेतन कहानी, आम आदमी की कहानी, अच्छी कहानी, सहज कहानी, समकालीन कहानी, जनवादी कहानी, उत्तरआधुनिक कहानी आदि अभिधानों से गुजरती हुई हिंदी कहानी का एक रोचक और सशक्त विधा के रूप में विस्तार हुआ है। पाठकीय लोकप्रियता एवं प्रसार की दृष्टि से कहानी आज सर्वाधिक पठनीय विधा के रूप में साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा एवं बहस-मुबाहिसे के केंद्र में है। आज कमोबेश सभी स्तरीय पत्रिकाएँ कहानी को न केवल प्रमुखता से प्रकाशित करती हैं, वरन् प्रमुख और उल्लेखनीय कहानियों पर पैनी नज़र रखते हुए उनकी समीक्षाएँ भी प्रकाशित करती हैं। कहानी का इतना प्रचार और प्रसार देखकर उसकी प्रासंगिकता और लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है और यह भी कहा जा सकता है कि वर्तमान दौर कहानियों का है। जीवन के द्वंद्व को, सामाजिक विसंगतियों को, यथार्थ जीवन की सच्चाई को, अपने समय को बेबाक़ और प्रभावी ढंग से व्यक्त कर पाने में कहानी आज सबसे महत्वपूर्ण और सफल विधा मानी जा सकती है। कहना चाहिए कि जिस तरह का यह समय है, उसको समग्रता में व्यक्त कर परिभाषित करने के लिए कहानी सर्वाधिक उपयुक्त, सबसे सफल विधा है। इतनी व्यापक स्वीकृति वाली विधा कहानी आज सचमुच साहित्य सर्जन की केंद्रीय विधा के रूप में समादृत है और वह वर्तमान रचनाशीलता का नेतृत्व करती है।
हिंदी कहानी की इतनी विविधता और उसके विस्तार को देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि जीवन की विसंगतियों को उभारने में आज कहानी धारदार हथियार की तरह इस्तेमाल होती है। एक आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी तक के परिवेश से जुड़ी कहानी आज जीवन के अन्तर्द्वन्द्व एवं संघर्ष, अंतर्विरोध एवं गतिरोधों को उभारने में अहम भूमिका का निर्वाह कर रही है। उसने जीवन को एक सार्थक अर्थवत्ता प्रदान करते हुए उसे नए तेवर, नए मुहावरे से संवलित किया है। आज बहुत से नए- पुराने कहानीकार सामाजिक सरोकारों के साथ गहराई से जुड़कर मनुष्य जीवन की विविधताओं को बहुत ही कलात्मक ढंग से अपनी कहानियों में उभारने की सार्थक पहल कर रहे हैं।
इस क्रम में कहानीलेखन के विस्तार और प्रसार की श्रृृंखला में मेरे सामने हरिप्रकाश राठी का नवीन कहानी संग्रह ‘अमरूद का पेड़’ है, जो उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संकलन है। इस संग्रह की अधिकतर(कमोबेश सभी) कहानियां पूर्व में किसी न किसी संग्रह में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके अनेक संग्रहों से गुणवत्ता और लोकप्रियता के आधार पर चुनकर तैयार किए गए इस संकलन में वे सभी कहानियाँ सम्मिलित कर ली गई हैं, जो कहानीकार की कहानीकला का प्रतिनिधित्व करती हैं। हालाँकि एक कहानीकार के लिए यह तय करना कठिन है कि उसकी प्रतिनिधि कहानियाँ कौन सी हैं, क्योंकि उसे तो अपनी हर रचना प्रिय होती है, पर कतिपय मानदंडों के आधार पर कुछ कहानियों का चयन करना संग्रह की अनिवार्यता और विवशता होती है। इस दृष्टि से स्वयं कहानीकार का कथन विचारणीय है-“चुनिंदा कहानियाँ किसी भी लेखक का एक विशिष्ट संग्रह होता है। बहुधा हर लेखक इन कहानियों का चयन करते समय यह कहता है कि लेखक की हर रचना, हर कहानी उसकी आत्मजा होती है एवं अपनी ही कहानियों में से कतिपय कहानियों का चयन करना दुष्कर कार्य है।” (अमरूद का पेड़, प्रसंगवश) बावजूद इसके कुछ आत्मीयजन की अकादमिक जिज्ञासा और पाठकीय अभिरुचि से तैयार किया गया उक्त संग्रह और उसमें सम्मिलित कहानियाँ हरिप्रकाश राठी के कहानीकार व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती हैं।
संग्रह ‘अमरूद का पेड़’ में हरिप्रकाश राठी के विविध संग्रहों से चुनकर कुल 33 कहानियाँ संकलित हैं, जिनमें उनकी कुछ चर्चित और प्रशंसित कहानियाँ(औरतें, संकल्प, ढाल, तृप्ति, पहली बरसात, अदृश्य हाथ, माटी के दीये, बहू-बेटी आदि) सम्मिलित हैं। ये कहानियाँ बहुत चर्चित हुईं और हरिप्रकाश राठी को एक कहानीकार के रूप में पहचान दिलाने में मददगार भी। एक पाठक की हैसियत से मैं हरिप्रकाश राठी के कहानी संग्रह(‘अगोचर’ एवं ‘साँप-सीढ़ी’) की कमोबेश सभी कहानियाँ मैं पूर्व में पढ़ चुका हूँ। उन संग्रहों की कुछ लोकप्रिय कहानियाँ भी यहाँ संकलित हैं।
संग्रह ‘अमरूद का पेड़’ की पहली ही कहानी ‘औरतें’ अकुंठ प्रेम और मैत्री-सामंजस्य की बहुत ही भावनाप्रधान कहानी है। महेंद्र और पम्मी के ज़रिए जिस तरह कहानी अतीत की स्मृतियों में ले जाकर संबंधों एवं रिश्तों की अनेक परतें खोलती हुई एक सुखद अनुभूति के साथ समाप्त होती है, वह बहुत आकर्षक और रोमांचक है। एक साहित्यकार/कहानीकार चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, कितना भी ऊँचा मुक़ाम हासिल कर ले, वह अपने गाँव, शहर, बचपन, परिवेश, घरपरिवार के साथ बीते हुए दिनों को कभी भूल नहीं पाता। जब-तब वह उन सब को याद करता रहता है, जो उसके बचपन की यादों से जुड़ा है। अतीत की पुरानी सुखद स्मृतियों में खोकर उन्हें स्मरण करना और उन यादों में खोकर कभी-कभी दुखी हो जाना साहित्य की भाषा में ‘नॉस्टेल्जिया’(nostalgia) कहलाता है । सीधे अर्थों में कहा जाए तो पुरानी यादों से संबंधित या पुरानी यादों से प्रभावित होना, अतीत की याद में आतुर परिचित चीजों या व्यक्तियों से दूर रहने और इंतजार करने के विषय से दुखी होना, अतीत के लिये लालायित रहना, परिचित चीजों या व्यक्तियों के लिए दूर उन्हें याद करते हुए दुखी हो जाना इत्यादि नॉस्टेल्जिया की परिधि में आते है। जो साहित्यकार या रचनाकार ऐसा करता है, उसे नॉस्टेल्जिक( nostalgic) कहा जाता है। अदब/ साहित्य की दुनिया में नॉस्टेल्जिया कोई बुरी बात नहीं है। कमोबेश सभी रचनाकारों ने अपनी पुरानी स्मृतियों से अपने साहित्य को सजाया- सँवारा है। मुझे तो लगता है कि नॉस्टेल्जिया साहित्य का सबसे सुखद पक्ष है, जो कल्पना की असीम ऊँची उड़ान से परे, हक़ीक़त की ज़मीन पर वापस लौट जाने का प्रयास है। इसलिए वह यथार्थ की ज़मीन पर स्थित अपने भूले बिसरे अतीत की ओर लौटकर एक अलग सुख का अनुभव करता है। ऐसा इसलिए,“कितनी चिड़िया उड़े आकाश/ दाना है धरती के पास” हालाँकि प्रायः अतीत का चलचित्र होने के कारण कोई कहानी नास्टेल्जिक प्रभाव से बच नहीं सकती, हाँ, मगर प्रभाव कम- अधिक हो सकता है। इसी कारण उस मूड में लिखी गई अनेक कहानियाँ संग्रह में विद्यमान हैं, जिनमें अमरूद का पेड़, तृप्ति, भटकते आकाश, पहली बरसात, माटी के दिए, आदि कहानियों का उल्लेख प्रमुखता से किया जा सकता है।
‘मेरे चंदा’ पारिवारिक रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक मनोविज्ञान की पीठिका पर आधारित एक अलग मूड की कहानी है, जहाँ पति-पत्नी के परस्पर संबधों पर समय के अंतराल में जमी धूल की परतों के बीच पनपी ऊब और एकरसता एवं रिश्तों की जड़ता को समाप्त कर संबंधों को पुनर्नवा और तरोताज़ा कर देती है।
कहानी लिखने के लिए अपने परिवेश की गहरी समझ के साथ आसपास की ज़िंदगी को शिद्दत से महसूस करना आवश्यक होता है। जितना व्यापक जीवन का अनुभव, उतना बड़ा रचनाकार। मेरे विचार से एक सर्जनशील जागरूक रचनाकार अपनी गहन अनुभूतिजन्य मानवीय संवेदना को अपने सर्जन के माध्यम से उकेरता है, जहाँ वह सामाजिक सरोकारों के साथ बहुत गहराई से जुड़ा होता है। एक सजग रचनाकार की प्रतिबद्धता समाज के उन लोगों के प्रति होती है, जो अपने मन की मूकभावना और पीड़ा को चाहकर भी व्यक्त नहीं कर पाते। इस दृष्टि से विचार करने पर ‘संकल्प’ एक भावपूर्ण कलात्मक कहानी है, जहाँ दो बच्चियों के पिता और नलिनी के पति मधुसूदन की एक्सीडेंट में अचानक हुई मौत के बाद उस पर आए घोर संकट से बिखरते परिवार को सँभालने और स्वयं के जीवन को बचाने के साथ पति की आकांक्षाओं को पूरा करने के दृढ़ संकल्प के साथ जिजीविषा की कहानी है। ऐसे संकल्प की शक्ति उसे पति की जलती चिता के परिपार्श्व से सुनाई देनेवाली प्रतिध्वनि से मिलती है- “मैं कहना चाहता हूँ कि कालचक्र स्वभावतः परिवर्तनशील है। यह दिन भी नहीं रहेंगे। सबको सुख-दुःख बारी-बारी से मिलते हैं। यहाँ पराभव है, तो अभ्युदय भी है। क्या जो तुम कल थी, आज हो? तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जो तुम आज हो कल नहीं रहोगी। तुम स्वयं को संयत करो। इस जगत में कौन है, जिसने ऊँच-नीच नहीं देखी! किसकी अवस्थाओं में उलटफेर नहीं हुआ। किसने निरंतर सुख पाया है?” यह सीख ही नलिनि के संकल्प का आधार बनती है।
संग्रह की अधिकतर कहानियाँ राजस्थान (विशेषकर मारवाड़ का सांस्कृतिक परिवेश) के परिवेश को चित्रित करने के कारण उनमें स्थानीय रंग व्यापक रूप में दिखाई देता है। हालाँकि हरिप्रकाश राठी की ज्यादातर कहानियों में प्रेम का रंग बहुत व्यापक और गहरा दिखाई देता है, फिर भी समाज और ज़िंदगी से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर उन्होंने अनेक कहानियाँ लिखी हैं। घर, परिवार, पारिवारिक रिश्ते-नाते, संस्कार, समाज, देश ऐसे अनेक पक्ष उनकी कहानियों के विषय बनते हैं, जिनमें उनकी अतिसंवेदनशील दृष्टि दिखाई देती है। पारिवारिक परिवेश के गार्हस्थिक संबंधों में स्त्री की बहुत महत्वपूर्ण और केंद्रीय भूमिका होती है। इस लिहाज़ से उसका शील, संस्कार, आचरण और व्यवहार एक नहीं, दो- दो परिवारों की गरिमा को बढ़ाने में सहायक होता है। माँ, बहन, बेटी, पत्नी, बहू आदि की विविध पारिवारिक भूमिकाओं में एक स्त्री के दायित्व और कर्तव्यों का दायरा बहुत व्यापक होता है। इस दृष्टि से विचार करने पर उक्त संग्रह की कहानी ‘बहू-बेटी’ एक उल्लेखनीय और ज़िम्मेदार कहानी है, जो पत्र शैली में एक श्वसुर द्वारा अपनी भावी बहू के नाम लिखी गई एक विस्तृत चिट्ठी है। यह एक ऐसी चिट्ठी है, जिसमें एक ओर घर परिवार से माता-पिता को छोड़कर जानेवाली बेटी के बिछोह से उत्पन्न रिक्तता में घर में बिखरी हुई उसकी स्मृतियों के परिप्रेक्ष्य में उसे याद करते हुए माता-पिता की पीड़ा है, दूसरी ओर एक पराए घर की बेटी के बहू बनकर उस परिवार में आने का उल्लास है, मानो उस बहू के आने से बेटी का रिक्त स्थान भर जाएगा। इसी प्रत्याशा में श्वसुर द्वारा बहू के नाम लिखी गई मार्मिक चिट्ठी पाठक को बहुत प्रभावित करती है। चिट्ठी में एक ओर बेटी के महत्व और गुणों का उल्लेख करते हुए भावुकता और भावना का सैलाब उमड़ता है, तो दूसरी ओर घर में आनेवाली बहू रूपी बेटी को उसके कर्तव्य, दायित्व, शील, संस्कार, चरित्र, आदि की विस्तार से शिक्षा दी गई है। यह चिट्ठी, मानो हर नवागत बहू के लिए एक शील, संस्कार,चरित्र की पारिवारिक आचारसंहिता का निर्माण करती प्रतीत होती है। इस दृष्टि से यह बहुत सफल और उल्लेखनीय कहानी कही जा सकती है। इस कहानी के वैशिष्ट्य को उजागर करने में विजयदान देथा की यह टिप्पणी बहुत सार्थक है- “कहानी ‘बहू-बेटी’ एवं ऐसी अनेक कहानियों की कोई भी क्या समीक्षा कर सकेगा, जो इतनी सटीक और सजीव हों। ताज्जुब है कि बिना चर्चित हुए राठी इतनी और ऐसी कहानियाँ लिख गए।" निसंदेह, बहू-बेटी एक बहुत जीवंत कहानी है, जिसमें श्वसुर द्वारा बहू को लिखी गई चिट्ठी हर बहू-बेटी के पढ़ने लायक है।
दरअसल, रचनात्मकता का संबंध साहित्यकार के अपने गहरे परिवेशगत जुड़ाव की सहज संवेदनात्मक अभिव्यक्ति से है, जहाँ वह अपने आसपास की जिंदगी को गहराई से समझता है और उसे अनुभूति के धरातल पर सहज संवेदना के साथ व्यक्त कर देता है। अकबर इलाहाबादी का संकेत भी शायद उसी वेदना की ओर है -
“दर्द को दिल में जगह दे अकबर
इल्म से शायरी नहीं आती ”
वास्तव में साहित्यिकता और रचनात्मकता का संबंध गहरी मानवीय संवेदना से होता है। गहन संवेदनात्मक अनुभूति जहाँ शब्दों के जरिए सहज ही फूट पड़े, वहीं एक अच्छी कहानी जन्म ले लेती है। दर्द केवल प्यार, मुहब्बत, इश्क का ही नहीं होता। जीवन में दर्द का फलक बहुत व्यापक है, बस उसे अनुभव करने की आवश्यकता है। जीवन में अनेक अभावों का दर्द, जीवनमूल्यों के विघटन का दर्द, अपनी जमीन से उजड़ जाने का दर्द, अपनों से बिछुड़ने का दर्द, आम आदमी की मूकव्यथा को जानने-समझने का दर्द, राष्ट्र-समाज के अपमान-अवमूल्यन का दर्द, जमाने की ठोकरें खाने का दर्द, अपनों से मिली उपेक्षा का दर्द, दबी-कुचली-छटपटाती-कराहती मानवता का दर्द, विवशता की व्यथा से कराहते आदमी की कष्टों में जकड़ी हुई जिंदगी का दर्द आदि। यही दर्द किसी कल्पनाशील मनुष्य को बहुत संवेदनशील बना देता है। यह संवेदनशीलता ही उसे वह दृष्टि प्रदान करती है, जिसके कारण कोई कहानीकार/रचनाकार आम आदमी की अव्यक्त भावना को शब्दचित्रों के माध्यम से कहानियों में ढाल देता है।
इस दृष्टि से उक्त संग्रह में कई कहानियाँ हैं, जो आमआदमी और जनसाधारण की जिंदगी के आसपास के परिवेश को चित्रित करती हैं, जहाँ कहानीकार का संवेदनात्मक पक्ष बहुत प्रबल और प्रभावी कहा जा सकता है। संग्रह की एक कहानी ‘तृप्ति’ एक ऐसी ही कहानी कही जा सकती है, जहाँ गरीबी और अभाव में घिसटते भूख और तृप्ति के मध्य उलझे एक भिखारी की करुणकथा का यथार्थ आख्यान प्रस्तुत किया गया है। इस कहानी को पढ़ते हुए उसका पात्र कलुवा मुझे प्रेमचंद की कालजयी कहानी कफन के घीसू-माधो की याद दिला गया, जहाँ घीसू अपने पुत्र माधव को बीस साल पुराने किसी भोज में खाए गए व्यंजनों की सजोई सुखद समृतियों में बहाकर ले जाता है हालांकि कफन गरीबी और भूख के मध्य सिसकती-कराहती एक ऐसे गरीब परिवार की प्रकंपित कर देनेवाली कहानी है, जहाँ भूख और तृप्ति के क्रम में कफन को भी बेचना जायज लगता है। तृप्ति और भूख के द्वंद्व में उलझती एक भिखारी की दर्दनाक कहानी ‘तृप्ति’ में कलुवा के भूख और तृप्ति की कहानी भी कम हृदयविदारक नहीं कही जा सकती। वर्षों से भरपेट भोजन की कल्पना में जीवन गुज़ारने वाले कलुवा को जब किसी भोज का निमंत्रण मिलता है, तो वह भोज के आनंदसुख की असीम कल्पना में खो जाता है। भोजवाले दिन उसे जीवन में पहली बार ‘तृप्ति’ मिलती है, जो उसके लिए पहली और आखि़री होती है । कहानी का अंतिम वाक्य हमें झकझोर कर रख देता है और सोचने पर मजबूर करता है-“भूख ने जिसे वर्षों ज़िंदा रखा, तृप्ति ने एक रात की मोहलत भी नहीं दी।” मुझे लगता है कि कहानी में यथार्थ तलाशने वालों के नज़रिए से सचाई के धरातल पर बेबाक़ चित्रण करती कहानी ‘तृप्ति’ इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कहानी कही जानी चाहिए।
जहाँ 'सत्यमेव जयते’ पुलिस-अपराधी के गठजोड़ की शिक्षाप्रद कहानी है, तो 'भटकते आकाश’ बदलते परिवेश में दांपत्य संबंधों में आई दरार से उपजे अवसाद, कुंठा, अकेलापन, संत्रास में उलझे भटकाव की कहानी है। 'नैहर’ कहानी में उत्कृष्ट वातावरण निर्माण के साथ ही कथ्य-शिल्प का अनूठा कलात्मक साहित्यिक सौंदर्य परिलक्षित होता है। 'अदृश्य हाथ’ एक विचारप्रधान कहानी है, जिसमें यथार्थ पर आधारित जीवनदर्शन व्यक्त हुआ है। 'भजनिया बॉस’ एक मनोरंजनप्रधान कहानी है, तो 'माटी के दीये’ का दर्दभरा बयान भावुक कर देने में पूरी तरह समर्थ है। कैकेयी-कथा जैसी कहानी में मिथकीय परंपरागत प्रयोग होते हुए भी कैकेयी के चारित्रिक वैशिष्ट्य को सहानुभूतिपूर्वक प्रस्तुत किया गया है, जिससे कैकेयी के प्रति तिरस्कार की जगह, सम्मान और श्रद्धा का भाव प्रकट होता है। अमरूद का पेड़ (जो इस संग्रह का शीर्षक भी है) मानवीय संवेदनशीलता की उत्कृष्ट कहानी कही जा सकती है, जहाँ प्रकृति प्रेम के धरातल पर पेड़ से भी मानवीय संबंध जोड़कर उसे अपना निकट सहयोगी मानने की कल्पना की गई है। कहानी का समापन बहुत आकर्षक है, जहाँ पेड़ के उजड़ने का दर्द मानवीय संवेदना के साथ अनुभव करना बहुत मार्मिक कहा जाना चाहिए।
संग्रह की अन्य उल्लेखनीय कहानियों में, ढाल, असल मुनाफ़ा, जीत, पहली बरसात, ख़ुद्दारी, कौल आदि के नाम सम्मिलित किए जा सकते हैं, जो हरिप्रकाश राठी के कहानी-लेखन का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती हैं। एक कहानीकार के रूप उन्होंने बहुत तेज़ी से अपनी पहचान बनाई है। उनकी कहानियों की ख़ुशबू हिंदी जगत के पाठकों तक व्यापक रूप में फैल रही है। पाठक और समीक्षक राठीजी की कहानियों का मूल्यांकन करते हुए उनके मर्म और वैशिष्ट्य को उद्घाटित करने का प्रयास कर रहे हैं। मैं हरिप्रकाश राठी की कहानियों को पढ़कर आश्वस्त हूँ, क्योंकि कथ्य, शिल्प, भाव, भाषा आदि की दृष्टि से कुछ कलात्मक कहानियों का सर्जन भी उन्होंने किया है। विश्वास है कि वे कहानियाँ उनकी अकादमिक पहचान सुनिश्चित करेंगी।
कह सकते हैं-
“हुजूमे- बुलबुल हुआ चमन में किया जो गुल ने जमाल पैदा
कमी नहीं कद्रदाँ की अकबर करें तो कोई कमाल पैदा
- प्रो. शंभुनाथ तिवारी
हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़ (भारत)
सुप्रसिद्ध समीक्षक
हिंदी के कथा साहित्य में हरिप्रकाश राठी एक सुप्रसिद्ध नाम है। इनकी अनेक कहानियाँ इधर कुछ महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पढ़ता रहा हूँ। इस बीच उनके दो कथा-संग्रहों को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ । ये हैं, अमरूद का पेड़ और परमात्मा नदारद है। राठी जी की कथा-यात्रा के महत्व को अगर एक उदाहरण से आँकना हो तो यह पर्याप्त है कि विजयदान देथा उर्फ बिज्जी जैसे कालजयी रचनाकार भी राठी जी की कहानियों के मुरीद रहे । कथा साहित्य से परिचित लगभग हर सजग पाठक राठी की कहानियों को पढ़ते हुए महसूस कर सकता है कि इन्होंने प्रेमचंद जैसे महत्वपूर्ण कथाकारों की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है। हिंदी साहित्य में अनेक ऐसे कथाकार भी नज़र आए, जिन्होंने कहानियों को प्रदूषित किया। कलावाद के नाम पर कहानी को अ-कहानी में तब्दील कर दिया। कला का खिलंदड़ापन कहानी में इस कदर हावी हुआ कि वहाँ कहानी गायब हो गई । बस कला-ही -कला नजर आने लगी। बेशक कला का अपना स्थान है, मगर कहानी कला में केवल कहानी होनी चाहिए। कहानी का मतलब यह है कि कोई कथा कही जा रही है । अगर कहानी में कहानी नहीं है, इधर-उधर की तमाम बातें हैं, तो उसे कहानी नहीं कहेंगे । कहानी का एक लक्ष्य बहुत स्पष्ट है कि वह कुछ कह रही है । कुछ कथा कह रही है। अगर उसमें कथा-तत्व ही नहीं है, तो काहे की कहानी! लेकिन खुशी के बात है कि राठी की तमाम कहानियों में कथातत्व सघनता के साथ मौजूद होते हैं। उनकी बुनावट बरबस आकर्षित करती है और कहानी का जो निकष है, उस पर वह सौ फीसदी खरी उतरती है।
अमरूद का पेड़ में राठी की तैंतीस कहानियां हैं, जो इनके विभिन्न संग्रहों से ली गई हैं। इनको पढ़ कर हृदय तृप्त हुआ। सबसे पहले मैंने संग्रह की कहानी 'अमरूद का पेड़’ ही पढ़ी। यह सोच कर कि आखिर यही शीर्षक क्यों रखा गया ? संग्रह में और भी कहानियां हैं जैसे औरतें, मेरे चंदा, महायोगी, सेंध, असल मुनाफा, पिशाच, फुहार, सत्यमेव जयते, माटी के दीये, आरोह-अवरोह आदि। इनमें से भी कोई शीर्षक हो सकता था। लेकिन अमरूद का पेड़ ही क्यों ? आखिर क्या है इस कहानी में। कहानी पढ़कर मैं अभिभूत हो गया। कथा सार यही है कि नवीन जी के आंगन में अमरूद का पेड़ है, जो खूब फल देता है और नवीन जी बड़ी उदारता के साथ अमरुद को मोहल्ले में भी बांट देते हैं। मोहल्ले के बच्चों को अमरूद तोड़ने में तकलीफ न हो इसलिए उनके लिए वे बांस का इंतजाम भी करते हैं। पत्नी उनकी इस हरकत से दुखी भी रहती है लेकिन वह कुछ कर नहीं सकती। बस बड़बड़ा के रह जाती है कि एक यही बेवकूफ था जगत में मेरे लिए। नवीन जी दफ्तर में बाबू हैं। आखिरकार उनका प्रमोशन हो जाता है और वे जोधपुर से जयपुर चले जाते हैं। लेकिन अमरूद के पेड़ की याद बनी रहती है। एक बार कार्यवश जोधपुर पहुंचकर अपने पुराने घर के अमरुद के पेड़ को देखना चाहते हैं लेकिन जब घर पहुंचते हैं तो पता चला अमरूद का पेड़ अब वहॉं नहीं है। उन्हें कॉलोनी के गिरीश जी ने बताया कि आपके जाने के बाद ही इस पेड़ के बुरे दिन आ गए। नये किराएदार शर्मा जी कड़क आदमी हैं । उन्होंने पेड़ पर किसी को चढ़ने नहीं दिया। अब बच्चे भी डर से मुंडेर पर नहीं जाते । पक्षियों को गुलेल से मारते रहते हैं और पेड़ के फल बांटने का तो सवाल ही नहीं। सिवाय खुद के खाने के किसी और को फल देना तो इन्होंने सीखा ही नहीं। थोड़े ही दिनों में जैसे पेड़ को नजर लग गई। पेड़ में कीड़े लग गए। इस वर्ष कोई फल नहीं आया। थोड़े दिनों में ही पेड़ ठूँठ हो गया और गिर गया। यह बात सुनकर नवीन जी को सदमा लगा फिर वह सोचने लगे और उनका जो चिंतन झकझोरने वाला है, जिसमें कहानी के पात्र नवीन जी सोचते हैं कि यह प्रकृति अपने आप में कितनी पूर्ण है। जब तक फल बंट रहे थे, फल आ रहे थे। ज्यों ही संचय शुरू हुआ, तो जैसे गंगोत्री ही कट गई। जो देना नहीं जानता, उसे प्रकृति देती भी नहीं है। यह कहानी एक बड़े संदेश के साथ खत्म होती है कि हमें उदारता के साथ दान करना चाहिए क्योंकि उपकारी व्यक्ति की संपत्ति कभी खाली नहीं होती। और यह देखा गया हम सब का अनुभव भी है। मेरे एक मित्र ने बताया था कि पड़ोस में ही एक घर में आम का बड़ा पेड़ था। उसमें फल लगते थे, लेकिन पेड़ की मालकिन किसी बच्चे को फल तोड़ने नहीं देती थी। उसका पति भी उसी की तरह निर्मम व्यक्ति था। हालत यह हुई कि वे मोहल्ले में बेहद अलोकप्रिय हो गए। जब मरे तो उनकी शव यात्रा में कोई शामिल नहीं हुआ। राठी की कहानी अमरूद का पेड़ बताती है कि फल बांटने वाले नवीन जी मोहल्ले में कितने लोकप्रिय थे। जब वे जोधपुर से विदा हो रहे थे तो मोहल्ले वालों ने उन्हें फूलों से लाद दिया। पेड़ से उनका गहरा लगाव था। जब जाने लगे तो पेड़ के गले से लिपट कर फफक-फफक कर रो पड़े । यह कहानी हमें वृक्षों से प्रेम करने की सीख देती है और पेड़ में लगे फलों को उदारता के साथ लोगों को बांटने की भी सीख देती है, जो जितना बांटता है, उतना ही समृद्ध होता है। देने वालों को सब की दुआएं भी लगती हैं। शायद इसी दुआओं का परिणाम था कि नवीन जी का प्रमोशन हुआ और वे बाबू से अधिकारी भी बन गए। अमरूद का पेड़ जैसी कहानियां मनुष्य के अंदर सुप्त मानवता को जाग्रत करने का काम करती हैं। इस दृष्टि से मुझे लगता है यह एक बड़ी कहानी है, जो वर्षों तक याद रखी जाएगी। संग्रह के शीर्षक को सार्थक भी करती है। संग्रह की लगभग सभी कहानियां मैंने पढीं, लेकिन सभी पर कुछ लिखने का मतलब बेहद विस्तार दे देना होगा इसलिए मैंने कुछ ही कहानियों पर ही लिखने की मानसिकता बनाई।
संग्रह की एक और कहानी है 'औरतें’। यह कहानी भी हृदय की अतल गहराइयों तक पहुंच जाती है। किशोर वय के मासूम प्रेम को जीवंत करती यह कहानी औरतों के मनोविज्ञान को भी बखूबी बयां करती है। वृद्ध हो चुके पात्र महेंद्र जी बचपन में बालिका पम्मी से भावनात्मक लगाव स्थापित कर चुके थे। वह पतंग उड़ाते थे और पम्मी उनकी गिड़गिड़ी पकड़ लेती थी। एक बार पम्मी उसके घर पढ़ने आई और पढ़ते-पढ़ते जब गहरी नींद में सो जाती है तो बालक महेंद्र उसकी फ्रॉक की चैन खोलकर उसके कमर में हाथ भी फिराता है। लेकिन उसकी हिम्मत नहीं होती और तुरंत हाथ बाहर निकाल लेता है और चुपके से जिप बंद करके चुपचाप ऐसे लेट गया मानो उसने कुछ किया ही ना हो। इस घटना के वर्षों बाद वही लड़की जब प्रौढ़ महिला के रूप में उनके सामने आती हैं तो महेंद्र जी चीख कर बोले, पम्मी तुम !और जवाब में महिला भी कहती है, महेंद्र तुम! महेंद्र जी उसे घर आकर चाय पीने की जिद करते हैं, तो पम्मी बचपन के दिनों को याद करके बोलती है, मैं नहीं आती। तुम्हारा क्या है, मुझे गिड़गिडी पकड़वा दो और खुद कनकव्वा उड़ाते रहो। कहानी का क्लाइमैक्स बेहद आल्हादकारी है ,जब पम्मी कहती है, मैं भीतर नहीं आती। मुझे तुम से डर लगता है। महेन्द्रजी पूछते हैं, क्यों क्यों? तो पम्मी कहती है, तुम्हारा क्या भरोसा, जाने कब जिप खोलकर हाथ फेरने लग जाओ। कहते-कहते पम्मी ने ऊपर के दांतो से नीचे का होंठ यूँ काटा मानो उन्हें पुरानी हरकतों की याद दिला रही हो । पम्मी की बात सुनकर महेंद्र जी कहते हैं, क्या बात कर रही हो पम्मी! तो पम्मी कहती है, बुद्धू ! उस रोज मैं सोई थोड़े न थी। इतना कहकर वह खिलखिलाकर हँसी और महेंद्र जी को देखते-देखते आगे बढ़ गई। यह कहानी नारी मन की भावनाओं को बहुत बारीकी के साथ अभिव्यक्त करती है। औरतें बहुत कुछ जानती- समझती रहती हैं, लेकिन वे मौन रह जाती हैं। वक्त आने पर ही उसे व्यक्त करती हैं। पूरी शालीनता के साथ कहानी किशोरवय के निश्चल प्रेम को प्रस्तुत करती है। इसे पढ़कर न जाने क्यों मुझे अमर कहानी उसने कहा था की याद आ गई। कहानी की सार्थकता यही है कि वह बेहद जीवंत और प्रामाणिक लगे। निसंदेह कहानी काल्पनिक हो सकती है, लेकिन पढ़ते हुए पाठक को यह महसूस होना चाहिए कि वह किसी यथार्थ तथ्य को अपने सामने घटित होते देख रहा है। और कभी-कभी पाठक को यह भी महसूस हो कि वह उसके जीवन की भी कहानी है। कम-से-कम मुझे तो अपने किशोर वय की मिलती-जुलती याद ताजा हो गई।
'मेरे चंदा’ कहानी मनोवैज्ञानिक भाव भंगिमा वाली है। कहानी मानव मन की परतें खोलने में सफल है। एक व्यक्ति अपने जीवन में अनेक बार अन्यमनस्क हो जाता है। अपनी ही दिनचर्या से उससे ऊब होने लगती है। खासकर दांपत्य जीवन में अगर एक लंबा अंतराल आ जाय तो अजीब सी एकरसता या जड़ता आ जाती है। इस भाव को कथाकार ने बहुत सुंदर ढंग से पिरोया है। मनन श्रीवास्तव अपनी पत्नी पूजा की बेरुखी से परेशान है। इस कारण मंजुरी नामक स्त्री के घर आना-जाना करने लगते हैं। मनन मंजुरी से पत्नी पूजा की शिकायत करते हैं कि न बात करने का सलीका न ढंग का पहनावा, न हीं कोई रूप- श्रृंगार। देखती ऐसे है मानो मैं पति न होकर जंग लगा लोहा हूं। वह बदलने को तैयार नहीं है। आप मनोवैज्ञानिक हैं आप ही बताएं मैं क्या करूं। मंजुरी पत्नी को आकर्षित करने का फार्मूला मनन को बताती है। यही कि पत्नी के सामने किसी दूसरी औरत के साथ भरपूर प्रेम से बातचीत करें। उसका परिणाम यह होगा कि पत्नी इस आशंका से पति को ज्यादा प्यार करने लगेगी कि कहीं उसका पति दूसरी महिला की ओर तो आकर्षित नहीं हो जाएगा। मनन इसी फार्मूले का इस्तेमाल करता है। मंजुरी मनन के घर आती है और मनन बेतकल्लुफी के साथ उससे हाथ मिलाता है और इतना ही नहीं लपक कर उसे बाहों में भी भर लेता है। यह योजना रामबाण सिद्ध होती है। और पूजा का व्यवहार मृदु दर मृदु होने लगा। वह अच्छे कपड़े पहनने लगी। इतना ही नहीं जब-तब रूप निखारने का प्रयास करने लगी। कहानी बेहद सात्विक है। कल्पना से परे है कथा का अंत। भारतीय संस्कारों से अनुप्राणित। मंजुरी एक दिन मनन श्रीवास्तव के घर पहुंचती है और कहती है, श्रीवास्तव साहब मेरे कोई भाई नहीं है। और सच माने इस दुनिया को देखकर कभी भाई बनाने की इच्छा भी नहीं हुई लेकिन आपने मेरा दिल जीत लिया। क्या मैं आपको राखी बांध सकती हूं। मनन अपनी कलाई बढ़ा देते हैं। राखी बंधवाते हुए मनन और मंजुरी की आंखें गीली हो जाती हैं। मंजुरी गदगद भाव से कहती है, मेरे चंदा ! उस वक्त मनन पूजा की ओर देखते हैं तो पाते हैं कि उससे अधिक प्रेमाश्रु उसकी आंखों से बह रहे थे क्योंकि 'पूजा को आज एक प्यारी- सी ननदी जो मिल गई थी।’ इस कहानी का उदात्त पक्ष यही है कि कहानी मूल्यों पर आधारित है। अगर तथाकथित उत्तर आधुनिक किस्म के लेखक ने ऐसी कहानी लिखी होती, तो उसका अंत बहुत संभव है घरफोडू भी हो सकता था। अवैध संबंधों की अश्लील बुनावट भी की जा सकती थी। लेकिन मेरे चंदा कहानी नैतिक मूल्यों को स्थापित करने वाली कहानी है। विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे अपनी ही कहानी 'जलकुंड’ याद आ गई, जिसका समापन भी बिल्कुल इसी तरह हुआ है कि पुरुष पात्र दिल्ली में अकेली रहने वाली युवती के बारे में कुछ गलत सोच कर एक दिन उससे मिलने जाता है। उस दिन रक्षा बंधन था। युवती उसकी बेसब्री से प्रतीक्षा करती है कि वह आए तो उसे रक्षाबंधन बांधे। तब पुरुष पात्र के मन से सारा भ्रम दूर हो जाता है। ऐसी कहानियां कम लिखी जा रही हैं, जो नैतिक मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश करती हैं न कि समाज को और अधिक पतित करने के लिए उकसाती हैं।
'महायोगी’ कहानी एक ऐसे बाबू की मानसिकता का चित्रण है जो बचपन की एक दुखद घटना का गवाह होने के कारण मानसिक रूप से बीमार रहने लगा । इस कारण उसका दांपत्य जीवन भी सुखी नहीं रहा। लेकिन जैसे ही उसका मनोचिकित्सक ने उपचार किया, उसके बाद वह धीरे-धीरे ठीक होना शुरू हुआ। सात वर्ष बाद उसके घर में पुत्र जन्म की किलकारी गूँजी। कई बार हम किसी गंभीर व्यक्ति को देखकर उसका मज़ाक उड़ाने लगते हैं लेकिन उसकी पृष्ठभूमि हम जानना नहीं चाहते कि उसके जीवन में कैसे भीषण तूफान आए होंगे। जैसे महायोगी कहानी के पात्र भूराराम के जीवन में आए थे । बचपन में उसने अपनी बहन का बलात्कार होते देखा था और यह बलात्कार उसके चाचा ने किया था । उस समय वह मात्र सात वर्ष का था । उसकी बहन चिल्लाती रही पर वह कुछ न कर सका। इस घटना से भूराराम के औसान जाते रहे । वह एक ऐसे मानसिक हादसे का शिकार हो गया, जिसका जिक्र अत्यंत दुखदाई है । लेकिन अंततः भूराराम अवसाद से बाहर आया। एक मानसिक रूप से व्यथित व्यक्ति के मनोभावों का सुंदर विश्लेषण इस कहानी में हुआ है। 'प्रतिनिधि’ कहानी धनवान मनुष्य के दंभ को तार-तार कर देने वाली कहानी है। अमूमन जो धनपति होते हैं, वे अपने धन पर इतराते रहते हैं। घमंडी हो जाते हैं। बात बात में 'तेरी औकात क्या है’ जैसे जुमलो का इस्तेमाल भी करते हैं । कहानी के मुख्य चरित्र पूर्णदत्त पहली बार हवाई यात्रा कर रहे हैं। वे खिड़की से नीचे निहार कर देखते हैं तो दंग रह जाते हैं कि उनका शहर कितना छोटा है और इसमें उनकी कंपनियां, जमीन तो नहीं के बराबर है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने अपने खगोल ज्ञान का भी विस्तार से वर्णन किया है, जिसका लाभ पाठकों को भी होता है। दूसरे पात्र प्रोफेसर शर्मा जो खगोल विज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे बताते हैं कि आप सामने उगते पूर्णमासी के चंद्रमा को देख रहे हैं । क्या आप जानते हैं कि यह पृथ्वी का आधा भी नहीं है। फिर प्रोफेसर शर्मा कहते हैं, आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि जैसे चंद्रमा पृथ्वी से छोटा है तो पृथ्वी बृहस्पति और शनि जैसे ग्रहों के आगे आधी भी नहीं है। इन तमाम बातों को सुनकर पूर्णदत्त का सारा दंभ खत्म हो जाता है। और जब हवाई जहाज से भी नीचे उतरते हैं तब उनकी कम्पनी का कारिंदा उनसे उनका ब्रीफकेस लेने का प्रयास करता है तो पूर्णदत्त उसे अपना ब्रीफकेस नहीं देते, खुद पकड़े रहते हैं ।कारिंदा उनसे पूछता है, मालिक रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई ? तो पूर्णदत्त जवाब देते हैं, मालिक नहीं, मैं तो मात्र प्रतिनिधि हूं। यह कहानी इसी शाश्वत सुंदर संदेश के साथ खत्म होती है कि संसार में हमारा अपना कुछ नहीं है। जो भी वैभव है, वो सब नश्वर है। जो कुछ भी हमारे पास है, दरअसल हम उसके मालिक नहीं, उसके प्रतिनिधि मात्र हैं। अगर मनुष्य में यह भाव जाग्रत हो जाए तो वह नर से नारायण बन जाए। हरिप्रकाश की यह कहानी भी आदमी को इंसान बनाने की दिशा में प्रेरित कर सकती है ।
संग्रह की एक कहानी 'एक और सुहागरात’ बेहद दिलचस्प कथा है । उसको पढ़ते हुए कोई भी पाठक रूमानी हो जाएगा । एक नवदंपत्ति हनीमून मनाने के लिए निकला है। सेकेंड एसी के डिब्बे में उनके सामने एक अस्सी वर्ष का बुजुर्ग बैठा है, जिस कारण वे खुल के अपना प्रेम का इज़हार भी नहीं कर सकते, तो बुजुर्ग अपने आप को गूंगा-बहरा बता कर ऊपर की बर्थ पर जाकर लेट जाता है और मजे से नवयुगल की रसभरी बातें सुनकर खुद नॉस्टैल्जिक हो जाता है। उसे अपनी सुहाग रात याद आती है और उस मीठी याद को सोचते हुए उसे ऐसा लगता है कि आज उसकी एक और सुहागरात हो गई । हालांकि उसकी पत्नी दस साल पहले मर चुकी है लेकिन नवयुगल की प्रणयबाजी देखकर उसके भीतर भी कामाग्नि भड़क जाती है और वह अपनी मधुनिशा में खो जाता है । कहानी के अंत में जब ट्रेन से नव दंपत्ति उतरते हैं तो बूढा उनसे बोलता है, 'थैंक यू न्यूलीवेड्स !गॉड ब्लेस यू !’ स्वाभाविक है नव दंपत्ति चौंक जाते हैं । जिसे गूंगा-बहरा समझकर मधुर बातें कर रहे थे, वह तो सुन सकता है। कहानी के अंत में कथाकार लिखता है, "यकायक मैंने देखा कि वही नवयुवक बिजली की गति से कोच में घुसा और मेरे कानों के समीप आकर जोर से बोला, बुड्ढे हरामी होते हैं।’’ उस ने सही कहा था, मैं इस महासत्य का कैसे विरोध करता। इस कहानी में अश्लीलता की भरपूर गुंजाइश थी, लेकिन कथाकार ने 'कहानी की मांग’ का बेजा इस्तेमाल नहीं किया और पूरी शालीनता के साथ सुहागरात के दृश्य को भी प्रस्तुत किया। लेखक निसंदेह मेरी परंपरा का अनुपालन करने वाला है कि कथाकार को पाठकों की कल्पना-शक्ति पर भी भरोसा करके बहुत विस्तार के साथ चीजों को बताने से बचना चाहिए। यही कारण है कि एक और सुहागरात में शालीनता का पूरा निर्वाह हुआ और यह रोमांटिक कहानी होने के साथ ही बेहद मनोरंजक भी बन गई है।
इस संग्रह की अंतिम कहानी 'कैकेयी-कथा’ चिर- परिचित पौराणिक आख्यान का एक तरह से पुनः प्रस्तुतीकरण है। केकेयी जिसे हम रामायण की खलनायिका के रूप में देखते हैं, उसकी आत्मकथा हरि प्रकाश ने प्रस्तुत की है। इस कहानी के माध्यम से हमें कैकेयी के राज्य कैकेय की कुछ सुंदर जानकारी प्राप्त होती है। कैकेयी के व्यक्तित्व को कथाकार ने बहुत ही जीवंत ढंग से रूपायित किया है। कथा के अंत में कैकेयी कहती है कि "बहुत कम लोग जानते हैं कि मंथरा की बुद्धि भ्रष्ट करने सरस्वती स्वयं देवों के अनुरोध पर अयोध्या आई थी । देव राक्षसों के वध के लिए राम को निमित्त बनाना चाहते थे। देवों की इस करतूत का मैं और मन्थरा दोनों शिकार हुई।’’ कथाकार ने एक पौराणिक आख्यान को नये कलेवर में आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत करके बड़ा ही सुंदर कार्य किया। कथन शैली बेहद प्रभावशाली है। महसूस होता है कि पाठक त्रेता युग की सैर कर रहा है। कथा को सरिता की तरह प्रवाहमान बना देना और उसकी सरसता को बरकरार रखना हरिप्रकाश जी की विशेषता है, जो बहुत कम कथाकारों में देखने को मिलती है। मैं भी एक कथाकार हूं लेकिन हरिप्रकाश जी की कहानियों को पढ़ते हुए लगा कि काश ! इसी तरह की दिलकश कहानियां मैंने भी लिखी होती।
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10 उपन्यास, 30 व्यंग्य-संग्रह, 4 कहानी-संग्रह, 7 ग़ज़ल-संग्रह सहित 90 पुस्तकें
सदस्य- हिंदी सलाहकार समिति, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, प्रांतीय अध्यक्ष, छत्तीसगढ़़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पूर्व सदस्य- साहित्य अकादमी, नई दिल्ली।
ये कितनी विचित्र बात है कि ज़िन्दगी के स्वाभाविक बहाव में न जाने कितने विलक्षण, दुखद, सुखद, अप्रत्याशित पल किसी संवेदनशील मानस में दर्ज होते रहते हैं और फिर स्मृतियों की लहर के आवेग में छलछलाती कलम से कागज के सीने पर किसी तैयार माल की शक्ल में कोई "कहानी’’ टपक जाती है।
फिर कोई नहीं जानता कि बहती नदी-सी इस कहानी के मुहाने पर कौन-कौन, कब-कब, कब-तक आएगा और इसे पढ़ेगा। हरिप्रकाश राठी भी कहानी लिखते हैं। हरिप्रकाशजी मेरे ऐसे मित्र हैं कि हम दोनों मिलने पर कुछ भी कहने-सुनने, हाथ मिलाने या एक दूसरे को अभिवादन करने से पहले एक दूसरे को देख कर जोर से खिलखिला कर हंसते हैं।
अब वो क्यों हंसते हैं ये तो वो ही बता सकते हैं पर मैं ये सोच कर हंसता हूं कि देखो, ये ही हैं जिन्होंने वो कहानी लिखी, वो कहानी लिखी.... वो " कहानी ’’ लिखते हैं।
मुझे एक साथ किसी जलती फुलझड़ी के चटकते शरारों की तरह उनकी कई कहानियां, उनके कई पात्र, उनके कई जुमले याद आते रहते हैं और मेरी हंसी और भी गदबदी, और भी खिलंदड़ी और भी उन्मुक्त होती जाती है। विचित्र बात ये है कि वो कोई हास्य व्यंग्य के रचनाकार नहीं हैं। पर्याप्त गंभीर और चिंतनाधर्मी आख्यान लिखते हैं। हिंदी की लगभग सभी छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में छपते हैं और उनकी डेढ़ सौ से ज्यादा कहानियों के अब तक कुल नौ संग्रह आ चुके हैं।
फिर ? क्या बात है ! हम दोनों हंसते क्यों हैं ?
शायद हम इसलिए हंसते होंगे कि आज से लगभग पैंतालीस साल पहले हम दोनों एक साथ एक ही नौकरी में आए थे। और जहां दूसरे लोग साठ साल के होकर रिटायर कर दिए जाने पर भी एक्सटेंशन के लिए भिड़े रहते हैं वहां हम दोनों ने उम्र का पचासवां साल आने से पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली और बैठ गए काग़ज काले करने।
मुझे उनकी कई बेहतरीन कहानियां याद हैं जिनमें उन्होंने सचमुच एक उम्दा कहानीकार के रूप में अपनी छाप छोड़ी है। अब चाहे वो वरिष्ठ नागरिक और वरिष्ठ साहित्यकार की श्रेणी में आ गए हो, जब वो कहते है कि "मैंने अब तक अपना बेस्ट नहीं लिखा या फिर मुझे कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला’’ तो मुझे वो उस किशोर लड़के की तरह नजर आते हैं जो किसी कैरमबोर्ड पर प्राण पण से, दत्तचित्त होकर रानी अर्थात् क्वीन निकालने के लिए पूरी तन्मयता से स्ट्राइकर दागता है, पर गोट है कि हर बार बाल-बाल बच जाती है।
राठी जी एक सिद्धहस्त कहानीकार हैं और देश के बड़े साहित्य पुरस्कारों से उतना ही दूर हैं जितनी दूरी से उड़नपरी पीटी उषा कभी ओलंपिक का पदक चूक गई थीं, अर्थात् सेंकड के सौंवे हिस्से से।
उनकी कहानी "अमरूद का पेड़’’ जो उनके प्रतिनिधि कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी भी है, मैंने स्वयं उनके ही मुंह से कुछ साल पहले मास्को की धरती पर सुनी थी।
उनका एक कहानी संग्रह "परमात्मा नदारद है’’ अभी हाल ही में आया है जिसकी कहानियों को पढ़कर एक बात तो निश्चित तौर पर सामने आती है कि उनकी कहानियों की बुनावट दौर का फैशन देखकर नहीं रची जाती । वो जो कहते हैं वो शायद पचास साल पहले भी उनका सच रहता और अगले पचास साल बाद तक भी वो उससे नहीं फिरेंगे। मतलब उन्हें मालूम है कि जीवन के महान सत्य की तरह जो चीज है वो तो है ही।
हरि प्रकाश राठी की कहानियों को पढ़ने के भी कुछ नियम हैं। यदि आप उनका पूरा पालन करेंगे तब आप आनंद के शिखर पर होंगे।
उनकी कहानियों में बोध-कथा, नीति-कथा, लघु-कथा, जातक-कथा वाली शैली तो गुंथी हुई जरूर रहती है किंतु एकाएक किसी तेज हवा के झोंके या बवंडर की तरफ उनकी अपनी बात भी अपनी मौलिकता में उठ कर इस तरह आपके सामने आती है कि वे आपको अपनी तरह के अकेले दिखाई देने लगते हैं।
उनके पास मुहावरों, उक्तियों, कहावतों का नायाब भंडार है। किंतु यहां भी वे प्रचलित कहावतों के अलग अर्थ निकाल देने में सक्षम हैं। यही खूबी भविष्य में नए मुहावरे रचती है।
उन्होंने अपने अवचेतन में दर्ज वास्तविक घटनाओं को भी खूब पेरा है। उनका कौशल आपको कभी आम तो कभी अमरूद खिलाता है।
वो अपनी आंखों के सामने घटे घटनाक्रम से अपनी बातों को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाते हैं। किंतु उनकी कल्पनाशीलता भी पर्याप्त परिपक्व है और वो बुनावट के जोड़ और गठानें आसानी से दिखने नहीं देते। ये महारत है। ये कौशल कम कहानीकार रखते हैं।
वे सक्षम बैंक अधिकारी रहे हैं। उस दौर की, वहां की व्यस्त जिन्दगी ने भी उन्हें कुछ ऐसे क्षण मुहैया कराए जिन्हें किसी बीज की तरह उन्होंने तब तो जेब में डाल लिया पर अब फुरसत की घड़ी में वो उन बीजों की फसल भी पूरे कौशल और चतुराई से लेते हैं। उनके पात्र सजीव होते हैं और उनकी कोई कहानी पढ़ने के बाद आप उनके पात्रों को आसानी से अपने इर्द-गिर्द चिन्ह सकते हैं। उनकी बहुत ज्यादा तारीफ करने का कोई लाभ नहीं है। आप तो जानते हैं कि घर की मुर्गी दाल बराबर होती है, हम ऐसे मित्र हैं कि मेरी बातों से वो फूलने वाले नहीं हैं।
लेकिन इसका एक लाभ भी है। वो उनकी तारीफ से खुश नहीं होंगे तो कमिया बताने से शायद नाराज भी न हो। तो मैं इसका फायदा उठाते हुए एक-दो बातें और कह दूं।
अपनी कुछ अच्छी कहानियों में वो अंत तक आते-आते हड़बड़ा भी जाते हैं। क्रिकेट की भाषा में कहूं तो वो अच्छे ओपनर हैं, खेल खत्म करने में उनसे कभी-कभी चूक होती है। बहरहाल, इससे उनके खिलाड़ी होने पर कोई आंच नहीं आती। वो बेहतरीन खेलते हैं।
उनके लिए और सार्थक भविष्य की मंगल कामनाएं।
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- प्रो. प्रबोध कुमार गोविल कहानी, उपन्यास, लघुकथा, नाटक, संस्मरण, बाल साहित्य, पटकथा लेखन सहित साहित्य की अधिकांश विधाओं में पिछले पांच दशकसे सक्रिय हैं। उनकी आत्मकथा के कुल चार खंडों में से तीन (इज्तिरार, लेडी ऑन द मून, तेरे शहर के मेरे लोग) प्रकाशित होकर पर्याप्त चर्चित हुए हैं। उनके कुछ उपन्यासों के अंग्रेजी, सिंधी, तेलुगु, ओड़िया, बंगाली, मराठी, पंजाबी, उर्दू, राजस्थानी, असमिया भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी से कई रचनाओं/वार्ताओं / साक्षात्कारों का प्रसारण। पत्रकारिता एवं जनसंचार के प्रोफेसर प्रबोध कुमार गोविल इस विश्वविद्यालय से निदेशक के रूप में सेवनिवृह होकर आजकल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। वे राही सहयोग संस्थान के कार्यकारी निदेशक भी हैं।
हरिप्रकाश राठी से मेरा व्यक्तिगत और साहित्यक परिचय किसी रेलगाड़ी के डिब्बे में घूमने के बाद अपनी साथ की सीट पर बैठे सहयात्री-सा है। साहित्य में जब आपके बाल श्वेत हो जाते हैं, आप सााहित्य की दुनिया में अपनी किताबों की सूची के साथ अग्रज हो जाते हैं... आदि- आदि होने के कारण आपको अध्यक्षता, मुख्य अतिथि टाइप दायित्वों का पालन करना ही पड़ता है। ऐसे ही किताबों की भूमिका लिखना, आशीर्वचन टाइप दो शब्द लिखना आदि भी आपके अपने लेखन में हस्तक्षेप करने लगते हैं। यह आग्रह आपको एक आसमान पर चढ़ाते हैं कि आपसे न करते नहीं बनती है। यह दीगर बात है कि कुछ ऐसे दायित्व होते हैं जिन्हें निभाकर आपको प्रसन्नता होती है।
हरिप्रकाश राठी भाई ने जब मुझसे आग्रहपूर्वक लिखने को कहा तो कुछ घनघोर व्यस्तताओं ने मुझसे न ही कहलवाई। पर जब उन्होंने अपने दो कहानी संकलन- परमात्मा नदारद है एवं अमरूद का पेड़ भेज दिए और एक सरसरी निगाह से इनके लिखे एवं परिचय को पढ़ा तो लगा कि लिखना ही होगा। इस उम्र में आप दो शब्द टाइप लिखने में सिद्धहस्त हो ही जाते हैं। कुछ विशेषण, मुहावरे ऐसे गढ़ लेते हैं कि ऐसा लिखना बाएं हाथ का खेल हो जाता है। पर जब दोनों संकलनों को पढ़ना आरम्भ किया तो लगा यह बाएं हाथ का खेल नहीं है। हरिप्रकाश राठी यूं ही लेखन के क्षेत्र में नहीं कूदे हैं न ही उनके लिए साहित्य केवल यश प्राप्ति, पुरस्कार प्राप्ति या अपने अहंकार के विस्तार का माध्यम है। वे अपने आसपास के समाज, अपने समय को बहुत बारीकी से देख-परख रहे हैं। मानवीय समाज की बेहतरी के लिए उनकी अपनी चिंताएं हैं। वे केवल चिंतक ही नहीं हैं, उनकी सोच समाधान भी लक्षित करती है।
हरिप्रकाश राठी ने अपने लिखने के मकसद को, अपने से ही प्रश्न करते हुए स्पष्टतः लिखा है। वे लिखते हैं -
जब प्रेम, पैसा, प्रसिद्धि अतृप्ति का कारण नहीं है तो मैं फिर लिख क्यों रहा हूं मुझे फिर कौन भीतर से किक करता है ? वह कौनसी अतृप्त अभीप्सा है जो एक अंतराल के बाद अजगर की तरह सर उठाकर खड़ी हो जाती है ? क्या मनुष्य इतना लिखकर भी महसूस करता है कि अब भी कुछ शेष है, अप्राप्य है जिसे वह ढूंढ रहा है ? कुछ तो है जो हमारी पार्थिव पकड़ से दूर है ? क्या ये वही है जिसे जानने की चाह में मनुष्य ने अनरवत साधना की, जप-तप-ध्यान किए, समाधिस्थ हुआ एवं अंत में नेति-नेति अर्थात् उसका कोई अन्त नहीं है, वह असीम है, अलभ्य है कहकर रह गया। संभवतः यह अज्ञात प्यास ही हमारे लेखक का उत्स है। अन्य सभी क्षुद्र तृष्णाएं इसी प्यास में आकर मिलती हैं। हर लेखक जीवन के किसी मोड़ पर महसूस करता है कि वह बूंदमात्र है लेकिन उसे सामने समुद्र छलछलाते हुए दिखता है। यह प्यास बूंद के समुद्र में समाकर समुद्र बनने की चाह है, क्षुद्र के विराट में समागम की अतृप्ति है। यही तो इस मन-हिरन की मृगमरीचिका है जो दौड़ाती भी है एवं मिलती भी नहीं। लेखक हीं क्यों यह समूचे जड़ जगत् की प्यास है। मोर इसी प्यास का प्रेरा पंख फैलाकर नाच रहा है, चकोर चन्द्रमा को तक रहा है। चातक स्वाति बूंद के लिये तरस रहा है, पेड़ आसमान छूने को लालायित है। इसी प्यास की मारी हवाएं सांय-सांय करती यहां-वहां सर पटकती हैं, धरती बादलों को पुकारती है, नदी-नाले मीलों का सफर कर रहे हैं एवं सूरज समाधिस्थ संत की तरह शताब्दियों से तप कर रहा है। समूचे ब्रह्माण्ड के प्रार्थी, अर्थार्थी एवं जिज्ञासु इसी प्यास के गुरूत्वाकर्षण में घूम रहे हैं। यही प्यास परिंदों की परवाज़ है। यह प्यास बनी रहे क्योंकि यह प्यास तमाम कड़वाहटों , छटपटाहटों के बीच अच्छी लगती है, जीवन को ,कलम को गति देती है। मुझे कवि बच्चन याद हो आए हैं ..... जिसने मुझको प्यासा रखा, बनी रहे वह भी हाला, जिसने जीवनभर दौड़ाया, बना रहे वह भी प्याला |
हरिप्रकाश राठी के लेखन का मकसद भौतिक सुखों की भूख नहीं एक अतृप्त प्यास है जिसे जीव अनंतकाल से महसूस कर रहा है। वे पूरी प्रकृति में इस प्यास का अनुभव कर रहे हैं। इसी प्यास के कारण उनमें लेखकीय अहंकार नहीं है। जो अतृप्त हैं वो कैसे अपने बहुत होने का घमंड कर सकता है। जिसे बूंद की तलाश है वो क्यों अपने सागर होने का भ्रम पालेगा। यही कारण है कि हरिप्रकाश राठी स्वयं को साहित्य सागर की एक बूंद भर मानते हैं। ऐसी सोच ही आपको साहित्य के उदात्त उद्देश्य की ओर ले जाती है। इसी सोच के कारण आप कुछ बड़ा सोच पाते हैं।
हरिप्रकाश राठी अपनी व्यापक दृष्टि और समाजिक सरोकारों युक्त सोच के कारण ही मानव हित की राह में पडे़ अवरोधों से मुठभेड़ करते हैं। वे अन्धविश्वास को मानवीय प्रगति का बड़ा अवरोध मानते हैं। उनकी कहानी 'अंधे ’ इसी सोच की कहानी है। इस कहानी में प्रोफेसर और मैं के बीच का संवाद उनकी इस सोच को रेखांकित करता है। यहां कहानी के अंश उद्धृत करना लाज़मी होगा -
मैंने बलात् विषय बदला।
"बचपन में मेरे पिता कहते थे, बिल्ली सामने से रास्ता काटकर निकल जाए तो समझो आगे कुछ अपशकुन होने वाला है। मैं लेकिन इन बातों में जरा भी विश्वास नहीं करता।’’
"यह जगत औंधी खोपड़ी है। यहां अधिकांश लोग भीतर से असुरक्षित हैं। यह सभी बातें हमारे मन की असुरक्षा को सहलाती हैं। हमारे देश में इसीलिए ऐसे अंधविश्वासों की बाढ़ है ।’’ प्रोफेसर साहब वहीं पत्थर के एक टुकड़े से कुछ कुरेदते हुए बोले।
"आप ठीक कहते हैं, इसीलिए देश में कोई भी अन्धविश्वास, कुरीति समय के साथ समाप्त होने की बजाए दृढ़ बनती जाती है। अनेक बार इन कुरीतियों, आडंबरों एव अन्धविश्वास को पीढ़ियाँ तक ढोती हैं। ’’ मैंने बात आगे बढ़ाई।
"ऐसी एक नहीं अनेक किम्वदन्तिया, अन्धविश्वास हमारे यहां घर-घर में फैले हुए हैं। शिक्षित-अशिक्षित सभी इनका शिकार हैं। जो कुरीतियां , विश्वास समाप्त हुए उसके लिए वर्षों संघर्ष किया गया। कोई प्रथा बन तो जाती है उसे हटाना मुश्किल है। सती-प्रथा , अग्नि-परीक्षा के चिन्ह आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। आज भी गाँवों में स्त्रियों को अंगारों पर चलाया जाता है। आज भी भूत-प्रेतों , चुड़ैलों के नाम पर भोपे लोगों की पिटाई करते हैं। आप यहां कोई अफ़वाह फैला दो, थोड़े दिन में लोग उस पर विश्वास करने लग जाएंगे। उनकी धारणाएं एवं चिंतन का जन-सैलाब इसे और मजबूत बना देगा । अंधविश्वासों की कच्ची मिट्टी फिर पत्थर बन जाएगी। इसी कारण आप-हम जहां बैठे हैं वह जगह इतनी सुंदर होते हुए भी लोग इसका लुत्फ़ नहीं ले पाते। ’’ इस बार उत्तर देने के बाद प्रोफेसर साहब कुछ क्षण के लिए मौन हो गए।
हरिप्रकाश राठी को जितना पढ़ रहा हूं उतना ही उनकी व्यापक सोच से परिचित हो रहा हूं। उनकी लगभग सभी कहानियों में पतनशील मानवीय सभ्यता को लेकर चिंताएं हैं। उनकी कहानियां पाठक से संवाद करती हैं एवं अद्भुत पठनीय हैं। बहुत कुछ लिखने का मन है पर न राठी के पास समय है, न मेरे पास। पर भविष्य में कहूँगा अवश्य। नोट्स ले लिए हैं।
फिलहाल शुभकामनाएं।
किताब और चश्मे का रिश्ता अटूट पाठकीय संबंध होता है। किताब रचनाकार के परिवेश व व्यक्तिगत अनुभवों का, लेखक के रचना सामर्थ्य व भाषाई क्षमता तथा विधा कौशल की अभिव्यक्ति होती है, वहीं चश्मा एक परिपक्व पाठक का प्रतीक है। मेरे जैसे एक नहीं अनेक पाठक हैं जिन्हें पढे़ बिना नींद नहीं आती। पत्र-पत्रिकाओं में मैं हरिप्रकाश राठी जी की कहानियां पढ़ता रहा हूं, जब उन पर लिखने का अवसर मिला तो कुछ और गंभीरता से उनकी किताबें 'परमात्मा नदारद है ’ तथा उनकी प्रसिद्ध चर्चित कृति 'अमरूद का पेड़ ’ पढ़ी, गूगल से भी उनके विषय में कुछ जानकारी ली।
वे मूलतः एक कहानीकार हैं। एक सफल बैंक अधिकारी को चर्चित , स्थापित कहानीकार बनाने के पीछे जो अपरोक्ष मनोवैज्ञानिक कारण मैं समझ सका, वह रहस्य मुझे उनके बचपन में अंतर्निहित मिला। उनके पिता की पुस्तकों की दुकान थी, जब भी अवसर मिलता विद्यार्थी हरिप्रकाश पुस्तकें पढ़ते जिसमें प्रेमचंद की कहानियों की किताबें भी शामिल थीं। शायद तभी, वर्षों पहले उनके मन में कहानी लेखक जन्म ले चुका था, पर जब उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन को अपनाया तब कहानी "अमरूद का पेड़’’ से मिली प्रसिद्धि ने उन्हें पाठकों के मन में स्थापित कर दिया। कहानियों का यही पेड़ पनपता गया और अब 150 से अधिक मर्मस्पर्शी कहानियो के सृजक हरिप्रकाश जी हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकार हैं, जिनकी कहानियां देश-विदेश के हिन्दी पाठकों को मेरी तरह पसंद हैं।
मैं पाता हूं कि हमारे आसपास के हर व्यक्ति की जिंदगी एक जीता जागता उपन्यास है। इन बिखरी जीवित कहानियो को पढ़ने का कौशल संवेदनशील मन में होता है। कहानी लेखक अपनी क्षमता के अनुसार अपने परिवेश से ही चरित्र के चित्र चुनता है, मन के डार्करूम में कहानी डेवेलप करता है और कलम कागज में पाठकों के लिये जीवंत कहानी बुन डालता है, कोई पत्र-पत्रिका, किताब कहानी की संवाहक बनती है और तब वह पाठकीय चश्मे से गुजरती है। पाठक के मन पर कहानी पढ़ एक चित्र बनता है। यह पाठकीय चित्र उस लेखकीय यथार्थ के जितना करीब व सजीव बन पाता है, जैसा कुछ देखकर लेखक ने कहानी कही होती है , उतना ही कहानीकार प्रभावी व सफल होता है। भावना सम्प्रेषण के इसी मापदंड पर चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी मात्र तीन कहानियां लिखकर हिन्दी जगत में अमर हो गये हैं।
हरिप्रकाशजी समीक्षा के मापदण्डों पर कहानी के तत्वों की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनके कथा-संग्रह ' पहली बरसात ’ की एक कहानी है "जीत’’, नायिका की कराटे के चैलेंज में नायक पर जीत का कौतुहल जब कहानी के अंत में पाठक पर उजागर होता है तो वह विस्मित रह जाता है। कहानी की परिभाषा है " कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बार में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो ’’, इस परिभाषा पर "जीत ’’ सस्पेंस के चरम तक पाठक को लाती है, आनंदित करती है और स्त्री विमर्श पर भी वैचारिक द्वंद की स्थिति में ले जाती है। महाभारत का कथानक है कि कुन्ती ने अर्जुन-कर्ण के युद्ध के पूर्व रात्रि में कर्ण से मिलकर युद्ध का परिणाम तय कर दिया था, कुछ इसी तरह 'जीत’ की नायिका को कहानीकार ने नायक से टकराव के परिणाम तय करते हुए रोचक तरीके से बुना है। कहानी में मुहावरों का सटीक प्रयोग हुआ है। यह मुहावरे कहानी को दमदार बनाते हैं। कहानी के कुछ अंश लाजवाब है -
सूरज जब बादलों को चीरकर निकला तब साढे दस बजे थे। तभी मानो बिजली कौंधी। मीना सफेद कुर्ता एवं पायजामा पहने सिंहनी की चाल से मैदान के बीच आयी। उसके कमर पर काला बेल्ट एवं सिर पर लाल फीता बँधा था। उसे देखते ही महेश ने मोर्चा संभाला। ताल ठोककर उसने दोनों पंजे आगे किये। भीड़ सांस रोके यह सब देख रही थी। कुछ पल के लिए मैदान में सन्नाटा छा गया। लेकिन यह क्या! मीना बिजली की गति से उछली एवं अपनी दोनों टांगों द्वारा तेजी से महेश की छाती पर वार किया। एक अद्भुत चमत्कार हुआ। महेश के मुँह से एक चीख निकली एवं वह वहीं बेहोश हो गया।
आज मोरनी साँप को खा गयी।
मीना ने दोनों तरफ एक-एक बार गर्दन घुमाकर अपने बाल हवा में लहराये एवं जैसे आयी थी वैसे ही गर्वीली चाल से अपने घर चली गयी। जाते हुए उसकी आँखें विजयदर्प से चमक रही थी।
सारे मौहल्ले ने दाँतों तले अंगुली दबा ली। ऐसी फ़ज़ीहत तो भगवान किसी पहलवान की न कराये। महेश के पट्ठों के मुँह लटक गये। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे, ‘‘बड़ा सूरमा बनता था, महेश तो मिट्टी का शेर निकला।’’ भीड़ में से एक बूढ़ा बोला।
‘‘बहुत होशियार कौआ एक दिन विष्ठा में चोंच मारता है।’’ दूसरे ने सुर में सुर मिलाया।
‘‘लाख जाय पर साख न जाय। बेचारा अब क्या खाकर यहाँ आयेगा।’’ इस बार भीड़ में से एक औरत बोली।
‘‘आज तो औरतजात की इज्जत दूनी हो गयी। लाख मोल वाला मर्द तो खाक का निकला।’’ पहली औरत की सहेली ने उसका साथ दिया।
इसी तरह कहानी के अंत का अंतिम पैरा आपको विस्मय में डाल देता है। यहां लेखक का सौन्दर्य बोध देखते बनता है -
‘‘तू ठीक कहता है मन्नु! लेकिन बीती रात एक अजीब हादसा हो गया। कल रात मैं सो रहा था तो आधी रात के कुछ देर बाद किसी ने मेरा कुण्डा खटखटाया। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखकर हैरान हो गया। मीना मेरे दरवाजे पर खड़ी थी। सफेद कुर्ता एवं सलवार पहने तथा काँधे पर लाल चुनरी डाले वह ऐसे लग रही थी मानो चाँद शरमाकर लाल हो गया हो। उसके माथे पर आयी पसीने की बूंदें कमल के पत्ते पर ठहरी ओंस की बूंदों की तरह लग रही थी। उसके रूप में चाँद बसा था एवं आँखों में सितारों की चमक थी। मैं स्तंभित रह गया। मैं कुछ कहता उसके पहले ही वह कमरे के अंदर आ गयी एवं दरवाजा बंद कर कुण्डा लगा दिया। कुण्डा लगाकर वह बेख़ौफ शेरनी की तरह मेरे पास आयी एवं अपनी दोनों बाँहें मेरे गले में डाल दी। मेरी आँखों से आँखें मिलाकर बोली, ‘‘जीवन में पहली बार कोई मर्द मिला है। सच पूछो तो तुम वह पुरुष हो जिसकी जन्मों से मुझे तलाश थी। अब मेरी तलाश पूरी हुई। इतना कहकर बेख़ौफ वह आगे बढ़ी एवं देखते-देखते मेरे होठों पर एक चुंबन जड़ दिया। ओह! उस चुंबन में कैसा अथाह सुख था। पल भर में मेरी आत्मा के आकाश पर सहस्रों बिजलियाँ कौंध गयी। उसके होंठ कितने मादक, कितने गरम थे। उसके रूप एवं जोश का मैं क्या बखान करूँ?मेरे पास कहने को क्या बचा था? मैंने बस इतना ही उतर दिया, "मैं भी तुम्हें मन ही मन चाहता हूँ।’’
‘‘मेरे चुंबन का फिर क्या प्रतिदान दोगे?’’ वह हँसते हुए बोली। उसका चेहरा एक अबूझ रहस्य से भरा था। उसकी उज्ज्वल हँसी से उसका चेहरा ऐसे खिल उठा था जैसे रंभा अपने रूप की मोहिनी डालकर मुझे वश में करने आयी हो।
कहानी के ये अंश आपके मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ते हैं।
ज्यों बांटे त्यों त्यों बढ़े, बिन खर्चे घटि जात यह उक्ति ज्ञान के लिये कही जाती है किन्तु "अमरूद का पेड़ ’’ पढ़कर लगता है कि यह मनोविज्ञान वृहद है। सरल शब्दों से सीधी घटना का रोचक वर्णन पाठक को बांधे रखता है। यहाँ भी कहानी के कतिपय अंश संवेदनशीलता के चरम हैं -
अमरूद का पेड़ जैसे उन्हें विदाई देने को खड़ा था, मूक और प्रगल्भ। उसे देखते ही भाव विभोेर हो गए। कसके पकड़ लिया उसे और फफक कर रो पडे़। इस शहर को छोड़ते हुए उन्हें सर्वाधिक दुःख इस पेड़ को छोड़ने का हो रहा था, मानो कोई भाई भाई से बिछुड़ रहा हो। संभलकर उन्होंने उस पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे उसे समझा रहे हो कि इस जीवन में कौन हमेशा साथ रहा है। हर रिश्ते की एक उम्र होती है, शायद तुम्हारा मेरा इतना ही साथ हो। नवीनजी शायद वहीं खडे़ रहते पर बाहर से बिटिया की आवाज सुनकर चौंके, ‘’पापा, काॅलोनी के सब लोग, बच्चे आपका बाहर इंतजार कर रहे हैं।’’
नवीनजी बाहर आए और आश्चर्यचकित रह गए। काॅलोनी के सभी लोगों ने उन्हें फूलों से लाद दिया। बच्चे-बूढ़े सभी उन्हें बाहर सरकारी गाड़ी तक छोड़ने आए। गाड़ी में बैठते-बैठते भी वो अमरूद का पेड़ देखना न भूले। शायद कह रहे हों, ‘‘मित्र, फिर मिलेंगे!’’
इसी तरह कहानी का अंत मानो सीधा हृदय में उतरता है -
वे चुपचाप आकर गाड़ी में बैठ गए एवं ड्राइवर को गाड़ी चलाने को कहा। गाड़ी में आते ठंडे झोंकों से शायद उनका मन शांत हुआ। सोचा यह प्रकृति अपने आप में कितनी पूर्ण है। जब तक फल बंट रहे थे, फल आ रहे थे। ज्योंही संचय शुरू हुआ, जैसे गंगौत्री ही कट गई। जो देना नहीं जानता उसे प्रकृति देती भी नहीं है। एक अजीब-से विषाद भरे इस ज्ञान के मर्म को सोचते-सोचते न जाने कब उनकी आँख लग गई।
लेखक ने इस कहानी के माध्यम से एक महान सन्देश कि ' हम देने में पाते हैं ’ अत्यन्त सरल शब्दों में बद्ध किया है।
हरिप्रकाश जी की प्रत्येक कहानी पर खूब लिखा जा सकता हैं, किन्तु वास्तविक आनन्द उन्हें पढ़ने, समझने, गुनने में ही मिल सकता है।
नारी के सृजन की रोचक कथा है " परमात्मा नदारद है’’ , उद्धृत करता हूं..... परमात्मा ने फूलों से कोमलता, तितलियों से चंचलता, भंवरों से किंचित बावरापन ..... कोयल से किंचित मिठास...... लेकर नारी का सृजन किया, पुरूश ने पूछा प्रभु इसकी कोई कमजोरी भी तो बताओ... इसकी एक मात्र कमजोरी इसकी प्रशंसा होगी ..... अद्भुत कथा-शिल्प, बारम्बार पढ़ने व मनन करने योग्य कहानी है। यहां भी कहानी के कुछ अंश मन मोह लेते हैं -
" प्रभु ! क्या मैं इसके साथ रह लूंगा ?’’ इस बार प्रश्न करते हुए पुरुष की आँखे फैल गई।
"तू इसके साथ रह भी लेगा, न भी रह सकेगा। इसके साथ और इसके बिना दोनों अवस्था में तेरी हालत देखने लायक होगी। चिंता न कर! बस इतना भर स्मरण रखना की तुम अगर इसके दुर्गुणों को पचा सके तो यह अपने अद्भुत गुणों से तुम्हारा जीवन धन्य कर देगी। जहां इसका आदर हुआ वे परिवार स्वर्ग से अधिक सुखकर होंगे एवं जहां अनादर मिला वे परिवार दोजख की आग में जल उठेंगे। इससे ज्यादा और क्या कहूं ? संक्षेप में यही कहूंगा कि तुम इसे समझ पाए तो यह तुम्हारे आनंद का स्रोत बन जायेगी एवं न समझ पाये तो मुक्ति का सोपान बन जाएगी।’’ कहते हुए परमात्मा कुछ क्षण के लिए ठहर गया।
पुरुष के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई।
कहानी का यह अंदाज सीधे हृदय में उतरता है।
कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने कहानी की परिभाषा करते हुए लिखा है कि कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता। 'परमात्मा नदारद है ’ ऐसी ही अद्भुत कथा रचना हुई है जिसे पढ़कर कोई भी समकालीन कहानीकारों में राठी जी को अव्वल पंक्ति में स्थापित कर सकता है।
हरिप्रकाशजी की कहानियां किसी कथा आंदोलन की प्रवक्ता न होकर कालजयी क्लासिक शैली की स्थाई बिम्ब वाली उम्दा कहानियां हैं । इसीलिए ये कहानियां आज हर पाठक वर्ग द्वारा पढ़ी जा रही हैं एवं आगे भी जिंदा रहेंगी क्योंकि ' क्लासिक ’ कभी नहीं मरता। इन कहानियों की कलात्मक गुणवत्ता एवं संवेदना देखते बनती है। यह कहानियां जीवन, सत्य एवं सौन्दर्य की त्रिवेणी हैं।
मुझे लगता है कि कथा लेखन पर उन्हें सम्मानित कर संस्थाएं स्वयं सम्मानित हुई हैं। उनकी कहानियों को पढ़, मुझे हरिप्रकाशजी के लेखन में एक साथ ही समकालीन कथा बिम्ब, स्त्री विमर्श, नवाचार, वैचारिक परिपक्वता, संदेश दिखते हैं। वे कुशल समाज शास्त्री, राष्ट्रवादी, हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रवर्तक, मनोवैज्ञानिक, भाषाविद, शब्दों के मितव्ययी, भावों की प्रबल रसधार बहाने वाले गुणी कहानीकार के रूप में समझ आते हैं। वे अपनी रचनाधर्मिता से पूर्ण संतुष्ट, कलम की अनथक यात्रा के सहयात्री हैं। मेरी मंगलकामना है कि वे निरंतर लिखें, अभी हिन्दी पाठकों को उनकी ढे़रों और नई नई कहानियां पढ़नी हैं। उनके सुदीर्घ, स्वस्थ, संपन्न लेखकीय जीवन की कामना करता हूं।
वरिष्ठ रचनाकार ,समीक्षक एवं संयोजक पाठक मंच
जोधपुर के श्री हरि प्रकाश राठी हिंदी के एक अनूठे कहानीकार हैं | उनके बारे में चकित करने वाली बात यह है कि वे सन 2000 तक साहित्य की दुनिया में नहीं थे। 2001 में बैंक की अपनी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद वे साहित्य की दुनिया में अवतरित होते हैं और पिछले लगभग दो दशकों में कोई डेढ़ सौ कहानियां लिख देते हैं । बात केवल संख्या की नहीं है । बात यह भी नहीं है कि उनकी कहानियां देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं । बात यह है कि उनकी कहानियों को पाठकों का भरपूर प्यार मिला है, और इस प्यार का रहस्य छिपा है उनकी कहानियों की बनावट और बुनावट में।
राठी जी अपनी कहानियों में संपूर्ण भारतीय जीवन को उसकी समृद्धविविधता में चित्रित करते हैं। वहां निम्न मध्यम और उच्च तीनों वर्ग अपने पूरे वैभव के साथ मौजूद हैं। असल में वे कहानियां गढ़ते हैं बल्कि जीवन को बहुत नज़दीक से देखते हैं और वहां से अपनी कहानियां उठाते हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए एक पल को भी यह नहीं लगता है कि वे कल्पना से किसी कहानी का निर्माण कर रहे हैं। बल्कि ऐसा लगता है कि वे जीवन को जैसा देखते हैं वैसा लिख रहे हैं। असल में तो ऐसा नहीं होता है। असल में तो कोई भी कहानीकार जीवन को जस का तस नहीं लिख देता है। वह जीवन से कुछ सूत्र, कुछ संकेत लेकर अपनी कहानी का निर्माण करता है। लेकिन उसका कौशल इसी बात में होता है कि उसका लिखा निर्मित ना हो कर अंकित प्रतीत हो।
राठी जी अपनी कहानियों में जीवन के जो दृश्य लाते हैं वे हमें अपने देखे-जाने और इसलिए आत्मीय लगते हैं। वे कहानियों में अप्रत्याशित और अकल्पित को लाने से सायास बचते हैं। उनकी कहानियों का विकास क्रम बहुत स्वाभाविक है, लेकिन इसके बावजूद जब वे अपनी कहानी को समेटते हैं तो पाठक को एक तृप्ति का, एक संतुष्टि का अनुभव होता है। वे अपनी कहानियों को किसी निश्चित परिणति तक ले जाते हैं और इसीलिए उनकी कहानियां मुकम्मल कहानियां प्रतीत होती हैं।
राठी जी अपनी कहानियों में परिवेश का चित्रण बहुत सावधानी से करते हैं । यहां न तो वे परिवेश का संकेत देकर आगे बढ़ जाते हैं और ना उसे इतना विस्तार देते हैं कि पाठक ऊब जाए। इस मामले में वे समकालीन पाठक की मानसिकता को बहुत अच्छी तरह समझते हैं और इसीलिए वे परिवेश को ठीक उतना स्पेस देते हैं जितना दिया जाना चाहिए। ना उससे एक रत्ती भर भी कम और ना एक रत्ती भर भी ज्यादा। यही बात उनकी कहानियों में चरित्रों की सृष्टि को लेकर भी कहना चाहता हूं। अपनी कहानियों में वे ज़रूरत भर के चरित्र लाते हैं। बेवजह उनके यहां कोई नहीं मिलेगा। राठी जी अपनी कहानी सर्जना में भाषा को लेकर भी बहुत सजग हैं। उनकी भाषा में प्रवाह है। भाषा सामान्य जन से ली गई है लेकिन उसे उन्होंने बहुत कौशल पूर्वक मांजा तराशा है, और इसलिए जब हम उनकी कहानियों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि परिष्कृत भाषा ऐसी ही होनी चाहिए। यह भाषा पाठक को संस्कारित करती है । उनकी भाषा का हल्का-सा झुकाव तत्सम की तरफ़ है, लेकिन यह झुकाव प्रीतिकर लगता है। इससे उनकी कहानियों में एक आभिजात्य आ गया है। मैं उनकी बहुत सारी कहानियों की चर्चा कर सकता हूं लेकिन पाता हूं कि हर कहानी का अपना वैशिष्ठ्य है और मेरा संकट यह है कि मैं किस कहानी की बात करूं और किस कहानी को छोड़ूं। ऐसा बहुत कम होता है कि आप किसी कहानीकार की बहुत सारी कहानियां पढ़ें और सभी कहानियों से समान रूप से प्रभावित हों। राठी जी की कहानियां इसी अपवाद को संभव बनाती हैं।
मैं कामना करता हूं कि राठी जी की लेखनी इसी तरह निर्बाध चलती रहें। हमारे समाज की बेहतरी के लिए हरिप्रकाश राठी जी का रचनात्मक अवदान अनमोल और अति आवश्यक है।
हरिप्रकाश राठी की कहानियों से होकर गुजरना अपने आसपास बिखरी अनुभूतियों से रूबरू होने जैसा है। जिन अहसासात को हम अपने दिल में दबाए बैठे हैं उन्हें सहजता से कहानी की शक्ल में ढालकर पाठकों के समक्ष रख देने में सिद्धहस्त राठी की हर रचना यूं तो बड़ी सादगी के साथ पाठकों के समक्ष आती है लेकिन रफ्ता-रफ्ता उसके भीतर छुपे गहरे अर्थ बोध अपना असर छोड़ते जाते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी के जिन छोटे अनुभवों को आम आदमी आसानी से नहीं पकड़ पाता, उन पर एक मुकम्मल कहानी गढ़ देना राठी का बाएं हाथ का खेल है। कथाकार कथाकार होता ही इसलिए है कि वह शब्दों को कथा रूपी माला में पिरोने की कला जानता है। जब वह अपने फन में महारत हासिल कर लेता है तो उसके पास विषयों का कहीं कोई अभाव नहीं रह जाता। उसके स्पर्श मात्र में रचना जन्म लेने लगती है। यही वजह है कि जहां दूर- दूर तक रचना की कोई संभावना नजर नहीं आती वहां से भी वह ऐसी रचना निकाल कर पाठकों की थाली में परोस देता है कि पढ़ने वाले दांतों तले उंगली दबाते रहे जाते हैं।
इनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि अरे! ऐसी स्थितियों में तो हम अपनी जिन्दगी में अनेक बार होकर गुजरे हैं लेकिन इस दृष्टि से तो हम सोच ही नहीं पाए कि यह किसी कहानी का इतना सशक्त विषय हो सकता है। इसीलिए राठी की हर कहानी पाठक को अपनी-सी या अपने आसपास की - सी लगती है। ऐसा कहीं नही लगता कि कहानी प्रयत्न पूर्वक गढ़ी गई है अथवा उसमें कोई बनावटीपन है। एक बार पाठक कहानी को पढ़ना शुरू करता है तो कहानी खत्म होने पर ही दम लेता है। उनकी हर कहानी में पाठक के लिए एक संदेश छुपा होता है, जो उसे अंत तक पढ़ने के बाद ही समझ में आता है। उनकी कोशिश समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना करते हुए एक मूल्य आधारित समाज की रचना करने की होती है। प्रेम , दया , सहानुभूति, मैत्री, करुणा, परदुखकातरता, मानवता, जीवदया, प्रकृति प्रेम की जो प्रवृत्ति आज के इन्सान की जिंदगी से प्रायः लुप्त होती जा रही है उसको केन्द्र में रखकर राठी कहानी का जो ताना बाना बुनते हैं उसका जादू पाठकों के सिर चढ़ कर बोलने से अपने को रोक नहीं पाता है।
कहानियों की भाषा सहज, सरल, रचना अनुरूप और बोधगम्य होने से पाठक की एकाग्रता एक पल को बाधित नहीं होती। विषय-वस्तु की जरूरत अनुसार मुहावरों और अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग भी यत्र-तत्र देखने को मिलता है। कहानियों को पढ़ते हुए कभी राठी एक समाज दृष्टि के रूप में तो कभी एक व्यंग्यकार के रूप में हमारे सामने आते हैं। आसपास की विसंगतियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए वे कभी विद्रूपताओं पर कोड़े बरसाते हैं तो कभी श्रेष्ठता की मिसाल पेश करते नायक की पीठ थपथपाते नजर आते हैं। उनका कहानी कहने का अंदाज और भाषाशैली पात्रों के अनुरूप बदलती रहती है। जब वे किसी स्थिति का शब्दांकन करते हैं तो घटित का संपूर्ण चित्र पाठकों के समक्ष उपस्थित कर देते हैं।
अगर उनकी कहानियों में से बतौर उदाहरण कुछ की बात करें तो 'सत्यमेव जयते’ कहानी की चर्चा की जा सकती है। है तो यह विवाह समारोह में पर्स चोरी होने की घटना का विवरण लेकिन एक कुशल न्यायाधीश की भांति कहानीकार पुलिस और अपराधियों की मिली भगत का पर्दाफ़ाश कर पाठकों के समक्ष अपना मंतव्य सामने लाते हुए जता देता है कि रचनाकार अपनी रचना ग्राह्यता की ख़ातिर ताना बाना कैसा भी बुने लेकिन अंततः वह समाज का सत्य पाठकों के सामने लाकर ही दम लेता है। यही उसकी रचनाधर्मिता का सत्यमेव जयते है। इस कथा के जरिए वे अपना यह संदेश भी पाठकों तक पहुंचाने में सफल होते हैं कि जब तक कानून के रक्षक ही भक्षक बने रह कर अपराध और अपराधियों से सांठगांठ कर उन्हें पुष्पित और पल्लवित करते रहेंगे तब तक राम राज्य की कल्पना भला कैसे साकार हो सकेगी।
आज जबकि इंसान एकाकी रहने का आदि होता जा रहा है, आत्मनिर्भर होने का मतलब बिना किसी पर निर्भर रहे अपनी जरूरतों को खुद पूरा करने तक सीमित कर दिया गया है, ऐसे में उनकी कहानी 'ढाल’ हमारे सामने आती है जो एक व्यक्ति की दूसरे के बिना जी नहीं पाने की आदत पर आधारित है। जिस मार्मिक ढंग से राठी ने इस कथा को कलम के जरिये कागज पर उतारा है उसे पढ़ कर कभी-कभी तो लगता है कि रचना सामर्थ्य इतनी है कि अगर उसे सही तरीके से पाठकों के समक्ष रखा जाए तो वह समाज को बदल भी सकती है। 'अमरूद का पेड़’ शीर्षक से लिखी गई उनकी एक कहानी यूं तो एक सहृदय सरकारी मुलाज़िम की कथा है जो किराए के अपने आंगन के अमरूद के पेड़ की परिवार के सदस्य की तरह देखभाल करता है और उसके मीठे फल चुन-चुन कर अपने दोस्त, मित्र, रिश्तेदार और बच्चे बड़े सभी को खिलाता है। जब कुछ समय बाद उसका तबादला दूसरे शहर में हो जाता है तब भी वह उस अमरूद के पेड़ को भूल नहीं पाता है। जब किसी सरकारी काम से एक दिन के अल्प प्रवास पर चंद घंटों के लिए उसे अपने उसी पुराने शहर में आना पड़ता है तब भी वह उस अमरूद के लहलहाते पेड़ के दीदार करने से अपने आपको रोक नहीं पाता लेकिन वहां जाकर आस-पड़ोस में रहने वाले पूर्व परिचितों से उसे पता चलता है कि नये किराएदार के शुष्क व्यवहार और किसी को भी अमरूद न बांटने का पेड़ पर ऐसा असर हुआ कि उसमें अमरूद आना ही बंद हो गये और वह लहलहाता फलदार पेड़ सूख कर कांटे में तब्दील हो गया। जब तक फल बांटते रहो तब तक उसमें फल आते रहेंगे और जैसे ही आपने बांटने में कोताही बरती पेड़ पर फल आना बंद हो गये। इस संदेश के साथ राठी तो कहानी का समापन कर देते हैं लेकिन बिना कहे यह बात उसमें से निकल कर पाठक के मन मस्तिष्क में गूंजती रहती है कि प्रकृति हो या मनुष्य सब प्रेम के भूखे हैं। जब तक प्रेम और सद्भाव का खाद पानी मिलता रहे वे लहलहाते रहते हैं और जैसे ही इस पर रोक लगती है वे सूख कर कांटा हो जाते हैं बिल्कुल उस अमरूद के पेड़ की तरह।
इस तरह उनकी हर कहानी कुछ कहने को विवश करती है। उनकी कहानी के कथाशिल्प पर मेरा यह विश्लेषण अधूरा ही रहेगा अगर मैं 'औरतें’ शीर्षक कहानी को पढ़ कर चुप रह जाऊं। इस कहानी की शुरूआत सेवानिवृत्त कर्मचारी की आत्मानुभूति से होती है। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है एक मंझे हुए कथाकार की भांति राठी रचना के सूत्र बिखेरते हुए पाठक को अपनी गिरफ्त में लेते चले जाते हैं। कहानी का पहला भाग जहां वृद्धावस्था को समर्पित है वहीं दूसरे भाग में नायक अपने बचपन की स्मृतियों में लौटता है और बाल से तरुण होती उम्र का अनकहा पवित्र प्यार हिलोरे मारकर परवान चढ़ता उसके पहले ही नायक नायिका का बिछोह हो जाता है और दोनों के बीच रह जाती है पहले प्यार की पहली छुअन की एक अनकही कसक। जिंदगी की भागमभाग में दोनों बचपन के इस लगाव को लगभग भूल ही जाते हैं । लेकिन उम्र के अंतिम पडाव पर जब अचानक एक दिन वे बचपन के बिछडे प्रेमी - प्रेमिका एक-दूसरे के सामने आते हैं तो उन दोनों में ही नहीं पाठकों में भी एक मीठी सी सिहरन पैदा हो उठती है। जो उन्हें अपने बचपन की स्मृतियों में लौटने को विवश कर देती है। इस तरह की अनेक रोमांचक अनुभूतियों से साक्षात्कार कराती हरिप्रकाश राठी की कहानियां जीवन के हर रंग में रंगी है। आवश्यकता सिर्फ उसमें से अपनी पसंद के रंग को चुनने की है। अगर जीवन में अवसर मिले तो अच्छा पढ़ने में रुचि रखने वाले किसी भी सहृदय पाठक को इन कहानियों से होकर अवश्य गुजरना चाहिए।
- वरिष्ठ रचनाकार एवं समीक्षक
किस व्यक्ति के जीवन में कौनसा क्षण कैसा मांगलिक मोड़ ले आये, कहना बड़ा कठिन है। एक व्यक्ति के हृदय में करुणा का स्रोत अनायास ही फूट पड़े और वह देव वाणी महाकाव्य रामायण का रचयिता वाल्मीकि के रूप में उभर आये, एक मीठी-सी झिड़की हुलसी के राम बोला को रामचरित मानस का प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास बना दे और तुलसी के राम जन जन के मन में रमने लग जाये, किसी नरेन्द्र को रामकृष्ण परमहंस का पावन स्पर्श स्वामी विवेकानन्द बना दे और बैंक के हिसाब किताब से जूझते रहने वाले एक समर्थ अधिकारी हरिप्रकाश राठी के मानस को कौन सा क्षण आन्दोलित कर दे और वह अपनी साधना, अध्ययन, अनुभव, चिन्तन करते हुए एक कथाकार के रूप में साहित्य जगत में प्रतिष्ठित हो जाय, यह सब बड़ा अद्भुत लगता है और इससे भी अद्भुत यह लगता है कि कुछ ही वर्षों में उनके कथा- संग्रहों में पाठकों को शताधिक कहानियां पढ़ने को मिल जाये और साहित्य जगत में उनकी सार्थक चर्चा होने लगे।
वैसे तो हरिप्रकाश राठी जी के नाम से मैं परिचित था, इनकी कहानियां राजस्थान पत्रिका, मधुमती आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, मैंने उन्हें पढ़ी भी हैं पर उनसे पहली मुलाकात 'होटल चन्द्रा इन ’ इनके कथा-संग्रह के लोकार्पण समारोह में हुई। इसके बाद अनेक साहित्यिक समारोहों में उनसे मिलाप होता रहा । अधिक निकटता का अवसर उस समय आया जब राठीजी की नवीनतम कथा-कृति 'माटी के दिये ’ का लोकार्पण 11 मई 2008 को स्थानीय 'मिनी सूचना केन्द्र गणेशलाल व्यास उस्ताद मिनी ऑडिटोरियम’ में आयोजित हुआ। इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा महादेवी वर्मा शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रकाशित स्मारिका का विमोचन भी था। इस अवसर पर लखनऊ से डाॅ. सूर्यप्रकाश दीक्षित व बीकानेर से वेद शर्मा भी आये जिन्होंने राठीजी की कहानियों पर सकारात्मक टिप्पणियां की।
जोधपुर के प्रतिष्ठित माहेश्वरी परिवार में 05 नवम्बर 1955 को जन्मे तथा यही शिक्षित-दीक्षित होकर यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया में लगभग 25 वर्षों तक विभिन्न प्रशासकीय पदों पर कार्यरत रहते हुए सन् 2001 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली और कहानी लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। एमकाॅम, सीएआईआईबी बैंक अधिकारी हरिप्रकाश राठी अब अधिक दिनों तक उस मौन निमंत्रण को कैसे ठुकरा सकते थे जो उन्हें हिन्दी कथा जगत में मिलता जा रहा था, अब उनके सामने सद्चिन्तन एवं साहित्य सर्जना का खुला मैदान होने के कारण अपने अनुभवों को कहानियों के माध्यम से कागज पर उतारना शुरू कर दिया, आखिर साहित्यकार नौकरी की बंदिशों में कब तक, क्यों और कैसे बंधा रहता ?
राठीजी की कहानियां बड़ी चर्चित रही हैं इसका सबूत है कि प्रो. अनंत भटनागर अजमेर, प्रो. श्रीकांत जरिया पुणे, प्रो. श्रीमती सुशीला अवस्थी, अनिल अनवर, डाॅ एस. जवाहर, डाॅ नंदलाल कल्ला, डाॅ सूर्यप्रकाश दीक्षित एवं डाॅ वेद शर्मा आदि अनेक विद्वानों ने इनकी कहानियों पर बड़ी सार्थक टिप्पणियां की हैं। डां. अनंत भटनागर ने तो यहां तक कहा कि श्री राठी के रूप में हिन्दी साहित्य को ऐसा बीज मिल गया है जिसमें अपने अंतरघट को फोड़कर वृक्ष बनने की सामर्थ्य है।
राठीजी के प्रकाशित सभी कहानी संग्रह मैंने पढ़े हैं। इन कहानियेां से गुजरते हुए मुझे यों लगा कि कथाकार ने इन कहानियों में मानवीय मूल्यों के विघटन से उपजे सर्वग्राही भौतिकवाद और उससे उत्पन्न आंच में झुलसती संवेदनाओं का जीवन्त चित्रण किया है। लेखक का विषय वस्तु संबंधी वैविध्य और अनुभव की व्यापकता और उन अनुभवों की सहज कल्पनाशीलता के सहारे अपनी खास शैली में कहानी बना देने की क्षमता विस्मयात्मक रूप से एक नयेपन और ताजगी का एहसास कराती है। राठीजी कहानी का मूल मसौदा जिन्दगी से उठाते हैं पर ऐसा लगता हे कि लिखते लिखते घटना बदल जाती है- वह पहले जैसी नहीं रहती, संवेदना व कल्पना उसे नया रूप दे देती है। ये जिन्दगी से लम्हें चुनते हैं और शब्दों में ढाल देते हैं कि जिन्दगी किसी भी कहानी से ज्यादा दिलचस्प होती है।
राठीजी की कहानियां पाठक के मन में उठते इस प्रश्न का उत्तर दे देती है कि उन्होंने यह कहानी क्यों लिखी ? लेखक के पास कहने को कुछ है और वह कहानी के माध्यम से ही उसे कह सकता है इसलिए कहानी लिखी गई है। राठीजी की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अधिकांश कहानियां जो एक बिन्दु से आरंभ होती है और दूसरे बिन्दु पर जाकर समाप्त होती है - इस बीच की जो यात्रा है - जिसे कहानी की कर्मभूमि कहते है , वह न तो बढ़ाई जा सकती है और न घटाई जा सकती है - वह अपने को ढकी-ढकी रखती है जिसके कारण उसका कहानीपन किसी भी स्थल पर इससे पहले समाप्त नहीं होता। हर अच्छा कथाकार कहानी के माध्यम से अपने विचार देता है पर राठीजी विचारधारा का निर्वाह करते हुए भी अपने विचारों को कहानी पर हावी नहीं होने देते। इनकी कहानियां आतंकित नहीं करती, पाठक के साथ संवाद कायम करती है। इन कहानियों के पढ़ने के बाद पाठक की जीवन दृष्टि में बदलाव आ जाता है। वह दृष्टि नहीं रहती जो कहानी पढ़ने से पहले थी। हर कहानी पाठक के साथ आत्मीय रिश्ता कायम करती है।
राठीजी की कहानियां गवाही देती है कि उन्हें किसी यथार्थवादी ढांचे या सरोकारों के लिए नहीं लिखा गया है क्योंकि सांचे कहानियों को निष्प्राण बनाते हैं जबकि कहानी के लिए तो अन्तर्मन की सहमति की जरूरत होती है। ये कहानियां जीवन की खुली किताब है। लेखक ने दुनिया देखी ही नहीं बल्कि उसके हर सफे को बारीकी से पढ़ा और तब ही उसे कहानियों में बयान किया है। वैसे ही चेहरे हमें इर्द गिर्द दिखाई देते हैं, वैसी ही घटनाएं कहीं-न-कहीं घट रही होती है जिनका जिक्र इन कहानियों में गहराई के साथ हुआ है। ये कहानियां सीधे-सीधे समय से जूझती हैं। हिन्दी के सुपरिचित विद्वान समीक्षक ने 11 मई को राठीजी के नये कहानी संग्रह 'माटी के दिये’ के लोकार्पण के समय उनकी कहानियों पर सार्थक टिप्पणी करते हुए कहा था- हरिप्रकाश राठी भाषा के स्तर पर, शिल्प के स्तर पर प्रेमचंद के निकट है। राठीजी के कथाकार की सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि घरौंदे टूट रहे हैं। शिक्षा व संपन्नता पति-पत्नी को दूर कर रहे हैं। सभी को सारा आकाश चाहिए। विवाह के संबंध में उपयोगिता का प्राधान्य होता जा रहा है, वस्तुओं की तरह पत्नियां बदली जा रही हैं- जैसे हम अपने टीवी एवं मोबाइल बदलते हैं। जिन्दगी को खाद पानी दे सके इतना हमारे पास समय ही नहीं है। नवधनाढ्य औरतों पर अधिक जुल्म कर रहे हैं। कभी वह बार में तो कभी आँफिस में, कभी पत्नी के रूप में तो कभी प्रेमिका के रूप में आज भी छली जा रही है - ऊपर से हम कितने ही प्रगतिवादी होने का ढोंग करें पर हमारी मानसिकता आज भी उतनी ही रूढ़िवादी है। जब तक स्त्री सब कुछ झेल रही है उसके सहारे परिवार चल रहे हैं , तब तक तो ठीक है लेकिन जिस दिन यह सिसकी विद्रोह में तब्दील हुई, परिवारों का टूटना तय है। आर्थिक तनाव, बाजारवाद, मुश्किल तो यह है कि बाजार घर में प्रवेश कर गया है और घर को, संयुक्त परिवार को तोड़ रहा है। ये सभी चिंताएं राठी जी की कहानियों में स्पष्ट परिलक्षित होती हैं। लेखक अपनी कहानियों के माध्यम से सच्चे सपनों और ईमानदार सांसों को जिन्दा रखने की कोशिश कर रहा है तथा ऐसे सिस्टम से संघर्षरत है जो आज भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है। उसके व्यक्तित्व व कृतित्व की झलक किसी लेखक की इन पंक्तियों में दिखाई देती है।
कहने को बहुत कुछ है, सहने को भी बहुत कुछ है।
लोग मर रहे है, दमन से भूख से,
पर हम जिंदा है, इसलिए कि हमें जिंदा रहना और लड़ना है।
कथाकार हरिप्रकाश राठी ने कहानी से संबंधित अपनी अवधारणा तथा रचना उद्देश्य एवं रचना प्रक्रिया पर हर कहानी संग्रह के आरंभ में प्रसंगवश शीर्षक से प्रकाश डाला है । यहां उनके पांचवें कहानी संग्रह 'पहली बरसात’ के प्रसंगवश में लिखे विचारों का उद्धृत कर रहा हूं-
'समय आ गया है जब हम साहित्य के आनंद का पुनर्जागरण करें। ऐसा न करना हमारी ऐतिहासिक भूल होगी। साहित्य सभ्य समाज की आत्मा है लेकिन आज इस पर मिट्टी की मोटी परतें चढ़ गई हैं। गिरते जीवन मूल्य एवं बेलगाम जीवन शैली हमारे सांस्कृतिक ह्रास की कथा लिख रहे हैं। कुटिल व्यावहारिकता के नाम पर चौतरफा बेईमानों की तूती बोल रही है। ऐसे में साहित्यकार को पुनः अपनी सेंटीपेडी मस्ती में लौटना होगा। अपने सृजन की कुदाली से हटानी होगी उसे जनमानस की आत्मा पर चढ़ी हुई मिट्टी की तहें। ’
कहानी को परिभाषित करते हुए तथा उसकी सार्थक भूमिका के प्रति अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए राठीजी ने अपने तीसरे कहानी संग्रह में प्रसंगवश में लिखा है -
कहानीकार क्या करता है ? वह तो मात्र अपने मन की गांठे खोलता है, मन के उलझे धागे सुलझाता है, अपने समय के यथार्थ को जैसे भी उसने देखा, समझा एवं भोगा है, शब्दों में पिरोता है लेकिन कहानी की सफलता तभी है जब इन्हें पढ़ते वक्त पाठक के मन की गांठे खुल जाये, उसके विचारों के उलझे धागे सुलझ जायें क्योंकि वह भी उसी यथार्थ का सहभोगी है।
राठीजी की यह सोच ऐसी है जिसमें असहमति की कोई गुंजाइश है ही नहीं और यह बात सच भी है कि कथाकार यही कुछ तो करता है - कथाकार ही क्यों कवि भी -
एक गांठ जो बैठ अकेले खेाली जाती
उससे सबके मन की गांठे खुल जाती है
एक गीत जो बैठ अकेले गाया जाता
अपने मन की पाती, दुनिया दोहराती है।
अपने प्रथम कहानी-संग्रह 'अगोचर’ में प्रसंगवश का आरम्भ उनके कथन के सत्य को प्रकाशित करता है जो उनके अपने सबंध में भी उतना ही खरा उतरता हैं। वे लिखते हैं 'हर बीज अपने भीतर वृक्ष बनने की संभावनाएं लिए हुए होता है -बशर्ते उसे सही समय पर खाद, पोषण, धूप व पानी मिल जाए। कई बार हम सभी के भीतर ऐसी संभाव्यताएं छिपी होती है जो उचित समय आने पर प्रस्फुटित होती हैं।’
राठीजी के कहानी संग्रहों का यह साहित्यिक सफर सबूत है कि वे अपने में छिपी संभावनाओं को संभव बनाते जा रहे हैं। प्रथम कहानी संग्रह 'अगोचर’ की प्रथम कहानी 'ढाल’ से लेकर नवीनतम कहानी-संग्रह 'माटी के दिये’ और 'धरोहर’ तक की कहानियां प्रो. वी.एल. पोरवाल के शब्दों में लिखे तो 'राठीजी की कहानियां उनके जन्म जन्मान्तर की साधना से परिपुष्ट होकर सनातन आस्थाओं, विश्वासों, मूल्यों और संवेदनाओं का अमृतकलश छलका रही हैं। ’
अति अल्प समय में विपुल साहित्य की सर्जना कर राठीजी ने जहां अपनी सृजन शक्ति एवं क्षमता का अद्भुत परिचय दिया है वहीं प्रामाणिक अनुभवों को कहानियों का रूप देकर साहित्य की सेवा भी कर रहे हैं।
वाणी में माधुर्य, व्यवहार में विनम्रता, विवेकसम्मत चिन्तन तथा अहंकार रहित आचरण कुल मिलाकर यह राठीजी के व्यक्तित्व की परिभाषा है। हिन्दी क्षेत्र में सुपरिचित हस्ताक्षर होते जा रहे राठीजी में कहीं भी यह भावना नहीं दिखाई देती है कि वे इस बात का एहसान जताए कि उन्होंने 2003 से 2008 के बीच शताधिक कहानियां लिखी है एवं कलम है कि स्रोतस्विनी की तरह अनवरत प्रवाहित होती ही जा रही है।
वैसे राठीजी से मिलना होता ही रहता है और जब कभी चर्चा होती है कहानी के कथानक पर - वह प्लाॅट जो उनके मन मस्तिष्क में घूमता है उस पर खुलकर चर्चा करते हैं और मुझे सुखद आश्चर्य तो तब होता है कि जिस विषय पर हमने कुछ दिन पहले चर्चा की थी वह कहानी के रूप में मेरे सामने आ जाती है, मैं उनकी साहित्य साधना की सराहना करता हूं।
कैसे एक व्यक्ति छब्बीस वर्ष तक बैंकिंग कैरियर में रहने के बाद आर्थिक लाभ एवं प्रशासनिक शक्तियों को तिलांजलि दे कथा लेखन को समर्पित हो जाता है, यह भी अद्भुत ही लगता है।
इस संबंध में उनका आत्म-कथन उद्धृत कर रहा हूं -
वर्ष 1976 से 2001 तक के छब्बीस वर्षीय चिर बैंकिंग कैरियर में मैंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि मैं कथा लेखन से जुडूंगा । कभी-कभी जीवन में जब विभिन्न प्रकार के लोगों से मिलता, उनका जीवन दर्शन अनुभूत करता अथवा स्वयं मेरे जीवन में विभिन्न घटनाओं को घटित होते हुए देखता तो कथा लेखन की इच्छा अवश्य होती पर समयाभाव अथवा ईश्वर की इच्छा नहीं होगी, अतः कथा लेखन को मूर्तरूप न दे पाया। हां ऐसा करने की भावना जीवन में कई बार उभरी। अप्रैल 2001 में बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद मुझे लिखने का यथेष्ट समय भी मिला एवं समुचित वातावरण भी। जून 2001 से दिसम्बर 2002 तक के मध्य मैंने इकत्तीस कहानियां लिखी। मेरी प्रथम कहानी 'अमरूद का पेड़’ 2 जनवरी 2002 को राजस्थान पत्रिका में छपी तब मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं लिख सकता हूं। यह कहानी हर वर्ग के पाठकों द्वारा सराही गई, तत्पश्चात् तो लेखन मेरी खुराक हो गया।
महर्षि सीताराम के इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है कि "सभी कहानियों में जीवन की समस्याओं का अत्यन्त सुंदर निरूपण हुआ है। आपने बैकिंग व्यवसाय से सेवानिवृति लेकर अल्प समय में जितना लिखा है वह किसी भी लेखक के लिए गौरव की बात है और इस प्रकार राठीजी अर्थनगर से भाव नगर में पहुंच गये हैं।’’
चलते चलते पहुंच गये हैं अर्थनगर से भाव नगर में
जाने कितने और मोड़ हैं, जीवन की सुनसान डगर में ।
- वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक। इस समीक्षा के लेखक राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च मीरा पुरस्कार से समादृत है। कुछ वर्ष पूर्व उनका निधन हो गया।
सभी कहानियां आज के यथार्थ पर आधारित हैं। हर कहानी में पात्रों का चित्रण अत्यन्त कुशलता से किया गया है। लगा जैसे यह पात्र मेरे ही जीवन के हों। 'दृष्टिकोण’, 'पीढ़ियां’ एवं 'कुम्हार’ कहानियों में तो जैसे मैं ही खड़ा हूं। अस्तु, कहानी वही है जो पात्रों का ऐसा जीवंत चित्रण करे कि पाठक स्वयं अथवा विकल्प रूप में उन्हें जीता हुआ महसूस करे। आप इस प्रयास में सर्वथा सफल रहे हैं। 'उत्तरकाल’, 'अनंग’ एवं 'यक्षप्रश्न’ कहानियां बेमिसाल हैं। 'नैहर’ कहानी में जीवन के गूढ़तम दर्शन की जीवंत प्रस्तुति है। ऐसे अद्भुत प्रयास के लिए बहुत-बहुत बधाई। ये कहानियां नई पीढ़ियों को दिशा भ्रमित होने से बचायेंगी। आशा है आप अपना मार्मिक सृजन जारी रखेंगे। आप पर मां सरस्वती की कृपा-वर्षा सदैव होती रहे।
- आर.के. त्रिवेदी
डीलिट्, आईएएस, पद्मभूषण, पूर्व राज्यपाल-गुजरात
आपके द्वारा रचित कहानियां हृदय की गहराइयों को छूने वाली हैं तथा इनमें मारवाड़ की माटी की महक यत्र-तत्र बिखरी महसूस होती है। इस प्रकार के उत्कृष्ट लेखन के लिए मेरी ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं स्वीकार करें।
महाराजा गजसिंह
मारवाड़-जोधपुर
राठीजी की कलम न तो किसी समीक्षक की प्रशंसा की तलबगार है, और न ही किसी शास्त्र के मर्म की मोहताज। लगता है उनकी कलम को शिव-नंदन गणेश ने थाम रखा है और भाव-गंगा माँ शारदा के वरद- हस्त से फूट पड़ी है। राठीजी की कहानियाँ उनके जन्म - जन्मातर की साधना से परिपुष्ट होकर सनातन आस्थाओं, विश्वासों, मूल्यों और संवेदनाओं का अमृत- कलश छलका रही हैं। एक - एक कहानी अपने मोहपाश में बाँध लेती हैं। राठीजी जड़-चेतन जगत् के कार्य-कलापों का चित्रगुप्ती हिसाब-किताब दिखाने-समझाने वाले एक सिद्धहस्त कहानीकार हैं।
प्रो. बी.एल. पोरवाल
भीलवाड़ा
एक लंबे अतंराल से कथा-सृजन इतना नीरस एवं उबाऊ बन चुका है कि कहानी पढ़ने का मन ही नहीं करता। श्री हरिप्रकाश राठी की कहानियाँ ऐसे समय में फुहार बनकर आई हैं। उनकी कहानियाँ विलक्षण एवं समाजोपयोगी तो हैं हीं रसयुक्त भी हैं। हर एक कहानी का कथानक नया, अनूठा एवं अद्भुत है। आप प्रेरे हुए इन कहानियों के साथ बहते चले जाते हैं। श्री राठी स्थितिप्रज्ञ की तरह समीक्षाओं, आलोचनाओं एवं प्रशंसा से विरक्त रहकर स्वांतःसुखाय रचनाकर्म करते हैं। सभी कहानियाँ लीक से हटकर तो हैं ही, आदर्शोन्मुखी भी हैं। कहानी के समाप्त होते-होते बड़ी कुशलता से वे आदर्श रोपित करते हैं। यह कहानियाँ अनेक रस सरिताओं का अनूठा संगम है। कहानियों में सौन्दर्यबोध एवं प्रकृति-चित्रण भी मनभावन हैं। यह कहानियाँ एक नये कथा-युग का आग़ाज कही जा सकती है।
चंद्रशेखर मूथा, आईएएस
मैंने 'प्रतिनिधि कहानियां’, लेखक हरिप्रकाश राठी को आद्योपांत पढ़ा है। प्रत्येक कहानी के एक-एक शब्द को पढ़कर कुछ अंशों को चिन्हित भी किया है। इन कहानियों के लेखक एक परिपक्व कहानीकार हैं, जिनके अब तक आठ-नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। संग्रह में 26 कहानियां हैं। पुस्तक का 'समर्पण' और 'प्रसंगवश’ बहुत अच्छे लिखे गए हैं। मैं किसी एक कहानी को सबसे अच्छी कहकर अपने ऊपर संकीर्णता की चादर ओढ़ने का साहस नहीं करना चाहता। फिर भी कुछ कहानियां जो मुझे अच्छी लगीं उनके नाम हैं - 'तृप्ति’, 'वचन’, 'सोने की चिड़िया’, 'खडूस’, 'पुटिया पीर’, 'निर्णय’, 'एक टुकड़ा बादल’, 'युगान्तर’, 'नसीहत’, 'ढाल’, 'फुहार’, 'अमरूद का पेड़’, आदि।
इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता है इनकी निजता, इनका अपनापन, इनका विशिष्ट स्टाइल, इनकी सम्प्रेषणीयता तथा इनकी आधुनिकता जो पाठक को कहानी के अंत तक अपने साथ रखती है। पाठक उस कहानी को बीच में नहीं छोड़ना चाहता। प्रत्येक कहानी के अंत में लिखा हुआ एक वाक्य अपने आप में विशेष है जिसके बिना वह कहानी अधूरी है। यह एक वाक्य ही उस कहानी की जान है, उसका निचोड़ है। इसके लिए लेखक विशेष बधाई के पात्र हैं। उदाहरण स्वरूप "भूख ने जिसे वर्षों जिंदा रखा, तृप्ति ने एक रात की मोहलत भी नहीं दी।’’ तृप्ति से, युगान्तर के एक नए मोड़ पर मैं खड़ा था, मैंने रिसीवर तुरंत उर्मिला के हाथ में दे दिया। युगान्तर से, घर पहुंचते-पहुंचते हल्की फुहार गिरने लगी थी, फुहार से। भाषाई सौंदर्य ने तथा कहीं-कहीं मुहावरों के प्रयोग ने इन कहानियों में चार चाँद लगाए हैं। मैं लेखक के भाषाई, साहित्यिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामान्य ज्ञान की प्रशंसा करता हूं। अत्यंत परिमार्जित भाषा में लिखी गई ये कहानियां हिन्दी साहित्य की धरोहर बनेंगी, इसमें सन्देह नहीं है। तत्सम शब्दों के प्रयोग ने इन कहानियों को बोझिल नहीं किया है वे कहानी के प्रवाह में सहायक सिद्ध हुए हैं ठीक उसी प्रकार जैसे पर्वतीय क्षेत्र के प्रपात जब भागीरथी में गिरते हैं तो वे उसकी शोभा को बढ़ाते हैं तथा उसकी नैसर्गिक गति को तीव्रतर करते हैं। अंग्रेजी के कुछ शब्दों का प्रयोग भी सहज और स्वाभाविक लगता है।
सभी रसों से परिपूर्ण इन कहानियों में प्रेम, करुणा, भय, अवसाद, हास्य, वीरता, आश्चर्य आदि सभी कुछ तो है। साथ ही इनमें विवेकामृत सर्वत्र विद्यमान है जिसने मानवीय संबंधों में कभी खटास नहीं आने दी। मानवीय संबंधों के ताने-बाने को ऊर्जावान बनाने में पारस्परिक सौहार्द तथा प्रेम ने अपनी निर्णायक भूमिका अदा की है जिससे ये कहानियां हमें आशान्वित करती हैं। समग्र रूप से कहा जा सकता है कि प्रत्येक कहानी में एक आदर्श छिपा है जो अनुकरणीय है तथा जो जीवन के शाश्वत मूल्यों की ओर इंगित करता है। अतः सभी कहानियां व्यक्ति को मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर ऊँचा उठाने मे सहायक है। यही विशेषता इनकी अपनी है जो और सब कथा साहित्य से इन्हें अलग करके इन्हें एक ऊँचे स्तर पर प्रतिष्ठित करती है और इन्हें एक ऊँचा आधार प्रदान करती है।
श्री हरिप्रकाश राठी एक सचेतन एवं संवेदनशील कथाकार हैं। उनकी रचनाएँ समय एवं मानवीय संवेदनाओं का सरल संवाद है। वे किसी वैचारिक अतिवाद से बाधित नहीं हैं। सभी तरह के अनुभव उनकी कहानियों में रचनात्मकता में बदल जाते हैं। पच्चीस वर्षों तक बैंक में कार्य करने एवं वाणिज्य के विद्यार्थी होने के उपरान्त भी उन्होंने उत्कृष्ट कथा-लेखन किया है। श्री राठी सूक्ष्म अनुभूतियों के कथाकार ही नहीं, सामाजिक चेतना के रंगकार भी हैं। इन्हें पढ़कर मन सरलता से उलझनों को पार करता है। इनकी कथाओं का फलक सूक्ष्म से साक्षात्कार करता है एवं किसी बड़बोलेपन का अपराधी नहीं है। श्री राठी की कथाओं में पारिवारिकता एवं राजस्थानी संस्कृति की आत्मीयता के सुमधुर स्वर सुनाई देते हैं। समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य के कोलाहल के बीच वे एक सुकून एवं भरोसे के कथाकार हैं। हर कहानी को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे इस कहानी का पात्र मैं स्वयं हूं अथवा यह कथानक मेरे परिवेश में ही कहीं घटित हुआ है। यह समरसता ही उनकी कहानियों को लय एवं गति देती है।
वेद व्यास
पूर्व अध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी
आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसा महसूस हुआ जैसे सारे पात्र मेरे इर्दगिर्द के हैं एवं जैसे मैं स्वयं इन पात्रों में खड़ी हूं। क्या हम सबका अवचेतन अथवा सुषुप्त मन एक-सा है? साहित्य के पठन-पाठन में मेरी प्रारंभ से ही रुचि रही है। निस्संदेह आपकी कहानियां शिवानी, प्रेमचंद एवं अमृता प्रीतम के समकक्ष हैं। मेरे घर में मेरी एक निजी लाइब्रेरी है। आपकी पुस्तकों को इस लाइब्रेरी में रखकर मुझे फ़ख्र हुआ है।
श्रीमती नीलम
दक्षिणी अफ्रीका
आपकी कई कहानियां इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि पढ़ते हुए मेरे आँसू बह गये। आपने जिस सहजता एवं साहस से समाज एवं जगत के सत्य को उजागर किया है, वाकई प्रशंसनीय है। कहानियां साहित्य के सभी मानदण्डों पर खरी उतरती हुई मन-मस्तिष्क को इतना उद्वेलित करती हैं कि पाठक प्रेरा हुआ-सा सोचने को विवश हो जाता है। इन कालजयी रचनाओं को पढ़कर अभिभूत हूं।
त्रिलोकसिंह ठकुरैला
वरिष्ठ कथाकार, आबू रोड़
पूर्व अध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी
इन कहानियों में मनुष्य की आस्था एवं विश्वास भरा पड़ा है। पाठकों के अकाल का रोना रोने वाले कहानीकारों के लिए यह कहानियां एक आश्चर्यजनक चुनौती हैं। संग्रह हाथ में लेकर प्रारंभ करने के बाद उसे छोड़ने का मन ही नहीं रहता । कथारस बुनने में राठीजी सिद्धहस्त है। सभी कहानियां मनुष्यता की पक्षधर हैं, आस्था का परचम लहराती हैं, आदर्शवाद की हिमायती हैं और अद्भुत पठनीय हैं।
डाॅ. आईदानसिंह भाटी
वरिष्ठ राजस्थानी साहित्यकार
‘जग कहता पोथिन की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी’, श्री राठी की कहानियां कबीर की इस उक्ति पर खरी उतरती हैं। प्रायः प्रत्येक साहित्यकार की सृजनात्मक यात्रा उसकी बाल्य अथवा किशोरवस्था से ही प्रारंभ हो जाती है। साहित्य एवं जीवन से उसका संवाद समानान्तर चलता है। जीवन अनुभवों का विकास ही उसके साहित्य का परिष्कार करता है। श्री राठी की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। उन्होंने जीवन को पहले जिया है, समाज को पहले जाना है, साहित्य को पहले समझा है उसके पश्चात् कलम को पकड़ा है। एक साहित्यकार के रूप में श्री राठी की यह विशिष्टता ही उनकी कहानियों को एक भिन्न धरातल देती है। कहानियों को पढ़ते हुए लगता है मानो चिंतन, दर्शन एवं इतिहास एक ही जगह समाहित हो गए हों । श्री राठी का सााहित्यिक जगत में प्रवेश एक अद्भुत घटना कही जा सकती है। कहानियों की भाषा, शिल्प एवं कथानक सभी प्रशंसनीय है। श्री राठी के रूप में हिंदी साहित्य को एक बीज मिल गया है जिसमें अपने अंतरघट को फोड़कर वृक्ष बनने की सामर्थ्य है।
प्रो. अनंत भटनागर
समीक्षक, अजमेर
हरिप्रकाश राठी का हिन्दी कहानी लेखन के क्षेत्र में आना एक धूमकेतु के प्रकट होने जैसा है। आयु के पचास तक पहुँचते-पहुँचते कोई कहानी लेखन प्रारंभ करे और सात-आठ वर्ष में एक सौ से अधिक कहानियां लिख ले, पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे, आठ संग्रहों में प्रकाशित हो जाए, यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि व अवदान से क्या कम है? पाठक भी राठी को खूब मिलने लगे, क्योंकि आज के भारतीय मध्यमवर्ग को, जो शिक्षित है, व्यवसायी है, जिसमें महिलाएं भी पढ़ने व मीडिया से अधिकाधिक जुड़ने लगी हैं, उन्हें राठी कथाकार में अपना कहानीकार मिला। कथानक, पात्र, जीवन की अनुकूल व प्रतिकूल परिस्थितियां, परंपरा व परिवर्तन के संक्रमण को साथ-साथ जीना, इन सभी को राठी ने जितना प्रमाणिक व पारदर्शी रूप में अपनी कहानियों में प्रस्तुति दी है, वैसा ‘ अपना चाहा-अपने को भाया’ राठी के पाठकों को आज मिलता कहां है? इस पर भी राठी उस बनावटी बौद्धिकता वाले नहीं हैं जिनकी कहानियां वैयक्तिक एकांगिता व जटिल मानसिकता से ग्रस्त-त्रस्त सी प्रस्तुत होती हैं। वरन्, राठी के स्वर व सरोकार पाठक को राहत देते व पाठक की चाहत बनते, सहज मानवीय सकारापन का संचार करते जैसे भी हैं। यों राठी की कहानियां मनोवैज्ञानिकता से बोझिल न होकर समाजशास्त्रीय खुलापन लिये हुए हैं। राठी यदि ऐसे ही लिखते रहे तो, प्रेमचंद जैसे गांव व जाति प्रधान समाज के कालजयी कथाकार की प्रसिद्धि पा सके थे, राठी भी आज के मध्यवर्ग व नगरीकृत हो रहे भारत के समयनिष्ठ कहानीकार होने की पहचान पा सकेंगे।
मैं आपकी कहानियां पढ़ते-पढ़ते हृदय से आपको आशीर्वाद देता चला गया। आपकी कहानियों ने आज के समाज का सटीक लेखा-जोखा किया है। कहानियां हृदयस्पर्शी तो हैं ही, प्रेरणास्पद भी हैं।
दीनदयाल ओझा
वरिष्ठ साहित्यकार
आपके कहानी संग्रह पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूं कि आपके भीतर एक सशक्त कहानीकार अपने तथा परिवेश के सुख दुःख के साथ जीने के लिए कटिबद्ध है। कहानियों में रचना कौशल एवं शिल्प वैविध्य तो है ही, कथानक बुनने में कसावट के प्रति गहरी ललक भी है। हर कहानी में किरदार की कशिश एवं समाधान तलाशने की कोशिश की जीवंत प्रस्तुति की गई है। अनेकानेक आशीर्वाद।
डाॅ. राजेन्द्रमोहन भटनागर
उदयपुर
कहानी संग्रह की तमाम कहानियां समाज की आईनादार है। सभी कहानियां इन्सानी जजब़ात एवं उसके कशमकश का सटीक बयां करती है। हर तरह का किरदार आपकी कहानियों में मौजूद है। खुदा से दुआ गो हूं कि खुदा आपको इसी तरह नसीहत आमेज कहानियां लिखने और समाज को सही राह दिखाने की ज्यादा से ज्यादा कुव्वत अता फरमाएं। आमीन!
अब्दुल सलाम मुजतर निशाती
छबड़ा
आपकी कहानियों की भाषा, शैली एवं भावों की त्रिवेणी अबाध गति से प्रवाहित होती हुई अंतरतल को छू लेती है। कहानी जीवन का सत्य है और यह सत्य तभी पता चलता है जब कहानी का हर पात्र अपना-सा लगता है। हर बार ऐसा लगता है जैसे हमने इसे स्वयं देखा एवं भोगा है। हम उस पात्र के साथ जीने लगते हैं, बहने लगते हैं। ऐसे उत्कृष्ट एवं संवेदनशील लेखन के लिए बहुत-बहुत बधाई।
पद्मादेवी
मुम्बई
मैं अब शतायु होने जा रहा हूं। कमजोर होने के बावजूद मैंने आपके सभी कहानी संग्रह पढ़े हैं। हर कहानी-संग्रह आपकी लेखन प्रतिभा के उत्तरोतर विकास की कथा कह रहा है। आपका कथाशिल्प अनायास ही प्रेमचंद युग के उत्कृष्ट लेखन की याद ताजा कर देता है। पश्चिमी राजस्थान के साथ यह त्रासदी रही है कि हमारा साहित्य राष्ट्रव्यापी नहीं बना। इसीलिए हमारी सांस्कृतिक समृद्धि को हम दूर-दराज तक पेश नहीं कर सके। हमारी इमेज मात्र खून चूसने वाले व्यवसायियों कीे होकर रह गई। आपकी पुस्तकें पढ़कर आशा बंधी है कि मारवाड़ की संस्कृति अपने लोकोपकारी रूप में जन-जन तक पहुँचेगी। ’श्राद्ध’, ’उत्तरकाल’, ’मायातीत’, ’पीढ़ियाँ’, ’कच्ची धूप’ एवं ’चिंतामणि’ जैसे कहानियां तो हम वृद्धों के लिए रेगिस्तान में पानी की ठण्डक की तरह हैं। बहुत-बहुत आशीष।
वैद्य अंबालाल जोशी
जोधपुर
आपके कहानी संग्रह जीवन के विविध रंगों का सटीक चित्रण करते हैं। कहानियों के माध्यम से जीवन का सत्य प्रकट करने का साहस विरले ही कर पाते हैं। इन कहानियों के माध्यम से आपने वह कह दिया है जिसे कहने-सुनने-समझने को हम सभी आतुर थे।
श्यामसुन्दर टावरी
अमरावती
आपकी कहानियों में एक सहजता है जो आकृष्ट करती है- कोई बनावट नहीं, भाषा की कोई कसीदेकारी, शाब्दिक अय्याशी एवं लफ्फाजी भी नहीं। साहित्य वही कालजयी है, जिसका मुख्य ध्येय आदर्शों की स्थापना करना होता है। आपकी कहानियां इस कसौटी पर खरी उतरती हैं।
पुष्पलता कश्यप
(समीक्षक एवं आलोचक)
आपकी कहानियों की भाषा शैली, पात्रों का चयन, कथानक एवं उपमाएं मुझे बहुत भाई एवं उन्होंने मुझे बांधकर रखा। एक वरिष्ठ बैंकर एवं वाणिज्य से जुड़े व्यक्ति का इन संग्रहों को लिखना एक आश्चर्य से कम नहीं।
आलोक सक्सेना
मस्कट (पाठक)
अच्छा साहित्य नेक इंसान, आदर्श समाज एवं युग निर्माण में सहयोगी होता है और यही सब बातें आपकी कहानियों में देखने को मिलती हैं। लोकोक्तियां एवं मुहावरों का प्रयोग, प्राकृतिक नज़ारों का चित्रण, ढलते-उगते सूर्य एवं पशु-पक्षियों का चित्रण मन को झकझोर कर रख देता है। यह केवल कहानी संग्रह ही नहीं, एक प्रेरणा स्रोत है।
शौकत अली
उदयपुर (पाठक)
आजकल उबाऊ विषयों पर पढ़ने का जी ही नहीं करता ................. यही सोचकर मैंने डरते-डरते राठीजी का कथासंग्रह 'सांप-सीढ़ी' खेाली। पहली कहानी ’लुगाई लट्टू’ पढ़ी ......... मैं चौकन्नी हुई और दत्तचित होकर पढ़ने लगी, आगे और पढ़ती गई ..... पढ़ती गई...... सारी रात एक बैठक में पुस्तक समाप्त हो गई और सुबह का सूरज मेरी खिड़की से झांकने लगा। अब मैं ’अगोचर’ पढ़ने को उतावली हो उठी। कहने का तात्पर्य यह है कि अच्छा साहित्य वह है जो मन को खींच ले, सुधबुध भूलकर उसमें डूब जाए और बार-बार पढ़ने पर भी पुराना न लगे। कहानियों का यही गुण उन्हें 'क्लासिकल लिटरेचर’ में शामिल कर देता है। मुझे कहने में कोई झिझक नहीं है कि राठीजी की कहानियां पढ़कर मुझे प्रेमचंद, मोपांसा, रवींद्रनाथ, टालस्टाय एवं शिवानी याद आए। प्रसिद्ध लेखकों की कहीं न कहीं शुरूआत होती ही है और राठीजी का यह प्रयास बहुत प्रशंसनीय है। अनेक शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद।
प्रो. (श्रीमती) सुशीला अवस्थी
वरिष्ठ कवयित्री एवं प्रबुद्ध पाठक
अच्छा साहित्य नेक इंसान, आदर्श समाज एवं युग निर्माण में सहयोगी होता है और यही सब बातें आपकी कहानियों में देखने को मिलती हैं। लोकोक्तियां एवं मुहावरों का प्रयोग, प्राकृतिक नज़ारों का चित्रण, ढलते-उगते सूर्य एवं पशु-पक्षियों का चित्रण मन को झकझोर कर रख देता है। यह केवल कहानी संग्रह ही नहीं, एक प्रेरणा स्रोत है।
शौकत अली
उदयपुर (पाठक)
श्री हरिप्रकाशजी राठी के सभी कहानी संग्रह पढ़ने का आनन्द मुझे प्राप्त हुआ है और मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह सकता हूं कि गत तीन-चार दशकों के पाठकीय क्रम में किसी एक लेखक की सारी की सारी कहानियां स्तरीय, पठनीय, उद्देश्यपूर्ण तथा रोचक लगी हों, ऐसा केवल श्री राठी के साथ हुआ है। अपनी कहानियों की परिधि में वे सारे संसार को समेटते हुए विविध विषयों पर बारीकी से नजर डालते हैं तथा उत्सुकता अन्त तक बनी रहती है।
अनिल अनवर
सम्पादक, 'मरू गुलशन’
जिस लेखक की लेखनी में सबलता प्रबलता से होती है, जो जन-जन की संवेदनाओं को प्रभावी अभिव्यक्ति देकर न्याय से उजागर कर सकता है, जिसकी परख सच्ची, पैनी एवं गंभीर हो, वही साहित्य जगत में अपना स्थान बना पाता है। श्री राठी इस मायने में एक सशक्त कहानीकार के रूप में उभरे हैं।
डाॅ. विनोद सोमानी ’हंस’
वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक एवं समीक्षक, अजमेर
मैं कोई नियमित या शौकीन पाठक नहीं हूं। एक बार बस यूं ही रात को नींद नहीं आ रही थी तो मैंने अल्मीरा से निकालकर आपका कहानी संग्रह 'सांप-सीढ़ी’ पढ़ा। मैं खुद आश्चर्यचकित थी कि जो नींद मात्र आधे घण्टे की दूरी पर थी, कपूर की तरह उड़ गई। सारी रात जागकर मैंने आपके तीनों कहानी संग्रह समाप्त किए। पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा कि मैं स्वयं इन कहानियों का एक हिस्सा हूं। मुझे पहली बार लगा कि हम सबके बीच एक सर्वव्यापी तत्त्व है, जिसे मैं आत्मिक स्पंदन या ऐसा ही कोई नाम दूंगी, जो हम सबको गहरे से छूता है, जो हम सबके बीच का सेतु है। सच मानिए, जितने गहरे आपकी कहानियों के शीर्षक हैं, उतने ही गहरी उनमें रची-बसी कहानियां। आपने असाधारण बातों को अत्यन्त साधारण शब्दों में समेट दिया है।
रीना चाण्डक, जोधपुर (पाठक)
कहानी का हृदयस्पर्शी एवं प्रेरणास्पद होना मेरी राय में कहानी की अनिवार्य शर्त है। बाकी सारे पेरामीटर्स सैकेण्डरी हैं। इस आधार पर आपकी कहानियां अद्वितीय हैं। एक-एक कहानी हृदय को झकझोर कर रख देती है। यही नहीं, हर कहानी का कथानक अनूठा एवं नया है। हर कहानी में अनुभव की गहराई एवं जीवन के सत्य का सटीक चित्रण है। सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, लौकिक एंव पारलौकिक किसी परिधि को नहीं छोड़ा गया है। निस्संदेह आपकी कहानियों के साथ एक नये कथायुग का प्रारंभ होता है। आपने कथारस के आनन्द से पाठकों को पुनर्परिचित करवाया है अन्यथा एक लम्बे समय से कहानियां पढ़ने का जी ही नहीं करता था।
प्रो. श्रीकांत के. जारिया
हिन्दी साहित्य संगम, पुणे
श्री राठी की दोनों पुस्तकें 'अगोचर’ एंव 'सांप-सीढ़ी’ अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी हैं। कहानियों का भाषा विन्यास, शैली एवं विचारों के अद्भुत तालमेल ने जुगलबंदी का समां बांध दिया है। मंथरगति से बहती नदी की तरह यह कहानियां पाठक को स्वयमेव अपने साथ बहा ले जाती हैं। अनेक पंक्तियों में लोकोक्ति बनने की सामर्थ्य हैं। यह कहानियां लेखक के आगामी लेखकीय जीवन की जीवंत संभावनाएं बतलाती हैं।
डाॅ. श्याम सखा 'श्याम'
कहानियों की बानगी, भाषाशिल्प एवं कथानकों ने मुझे अभिभूत कर दिया। वाह! बहुत श्रेष्ठ! मां शारदा का आशीर्वाद एवं लाड़ आप पर सदैव यूं ही बना रहे।
श्री गगन मालपानी
जयपुर (पाठक)
सरल, सरस शैली में लेखक ने आम आदमी की उन अनुभूतियों, संवेदनाओं और विचारों को अभिव्यक्ति दी है जो उनके मन को उद्वेलित तो करती है पर वह व्यक्त नहीं कर पाता। उर्दू, मारवाड़ी के जुमलों और लोकोक्तियों से कहानियां और सजीव हो उठी हैं। अधिकांश कहानियां शाश्वत मूल्यों पर चिंतन के लिए प्रेरित करती हैं।
डाॅ. एस. जवाहर
पूर्व निदेशक, काॅलेज शिक्षा, जयपुर (राज.)
आपके कहानी संग्रहों पढ़कर मन प्रफुल्लित हो गया। दिल को गहरे से कहीं सुकून मिला । सभी कहानियां कल्पना एवं यथार्थ का अद्भुत संगम है। कहानियां पढ़ते हुए हर बार ऐसा लगा जैसे कोई हमारे ही दिमाग से कहानियों के कथ्य को खींच रहा है। इसी कारण संग्रहेां को बार-बार पढ़ने को मन होता है। ऐसे उत्कृष्ट एवं मर्मस्पर्शी लेखन के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें।
नंदिनी
चामुख (हिमाचल प्रदेश)
आपकी पुस्तकें हाथ में क्या आई, बस मजा आ गया। हर कहानी का कथ्य, भाषा विन्यास एवं शैली अनुपम ही नहीं, उत्कृष्ट भी है। अपने कलम की दिशा मध्यम वर्ग से निम्न मध्यम वर्ग एवं ग्रामीण परिवेश की ओर भी मोड़िये ताकि इस वर्ग की समस्याओं पर भी आपके विचार जाने जा सकें।
एस.के. पाल
लाहौलस्पिति
श्री राठी के बारे में मेरे पिता लोकप्रतिष्ठित कथाकार श्री विजयदान देथा ‘बिज्जी’ की प्रतिक्रियाएँ एवं टिप्पणियाँ देकर मैं आश्चर्यमुग्ध हूँ। वैसे तो उनका लेखन-पठन आयु के पिच्यासी वर्ष तक पहुँचते थम सा गया था, लेकिन मुझेे एवं उनके अन्य मिलने वालो को भी तब यह जानकर अचरज हेाता था कि वे श्री राठी की कहानियाँ न सिर्फ चाव से पढ़ते थे, उन्होंने इन पुस्तकों को अपनी आदत के अनुसार रेखांकन,टिप्पणियेां से भी भर दिया था। यह श्री राठी को एक गुरूत्तर लेखक का आशीर्वाद था। बिज्जी जहां अपने पाठकीय मूल्याकंन में अच्छे-अच्छों को स्पेअर नहीं करते थे, श्री राठी को उनकी अपार सराहना मिली। वे अपने मिलने वालों से कहते भी थे कि वर्तमान दौर में मध्यमवर्ग की मनोवृत्तियों को निकट से देखना-समझना हो तो राठी की कहानियां पढ़ी जाए। इसी परिप्रेक्ष्य में मुझे लगता है कि वर्तमान दौर में जहां एक लम्बे समय तक हिन्दी के साहित्यकार अपनी पहचान नहीं बना पाते, श्री राठी ने हिन्दी के कहानीकारों में एक विशेष नाम बनाया है। मैं श्री राठी की पुस्तकों पर मेरे पिता की कुछ टिप्पणियां उद्धृत करना चाहूंगा -
"राठी की कहानियां का प्रारंभ एवं अंत ऐसा होता है कि इससे बेहतर अन्य हो भी नहीं सकता।’’
"राठी की कहानियां जीवंत, मुंहबोली एवं आस-पास की सच्चाइयाँ लगती हैं।’’
"कहानी 'बहू-बेटी’ एवं ऐसी अन्य अनेक कहानियों की कोई भी क्या समीक्षा कर सकेगा जो इतनी सटीक एवं सजीव हों ? ताज्जुब है कि बिना चर्चित हुए राठी इतनी एवं ऐसी कहानियां लिख गए। ’’
"राठी कहानी का ताना-बाना बुनने में उस्ताद हैं, वे मानो कथारस घोलते एवं पिलाते हैं।’’
"राठी की कहानियों की भाषा व शैली की भी अपनी छटा है और पांरपरिक प्रयुक्तियां भी क्या खूब हैं। ’’
"राठी की कहानियां हवा के उन्मान बहती हैं।’’
" 'धरोहर’ कहानी पर बिज्जी ने लिखा - 'ऐसी कहानी तो मुझे लिखनी चाहिए थी।’ ’’
कैलाश कबीर
बोरूंदा
श्री हरिप्रकाश राठी की कहानियों ने मुझे बेहद प्रभावित किया। इन कहानियों में जीवन-द्रव और विचार-खनिज की प्रचुरता देखते ही बनती है। मैंने हाल ही में राठीजी की कहानियों को दुबारा पढ़ कर स्वयं को अनुभव समृद्ध पाया। यथार्थ और कल्पना, शिल्प और संवेदना, कहावतों-मुहावरों की लोकशब्दावली का मिठास और जीवन की जद्दोजहद को जिस खूबसूरती से आपने अपनी कहानियों में बुना है वह लाजवाब है। हरिप्रकाश जी राठी की कहानियों की एक विशेषता यह भी है कि वे प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। वस्तुनिष्ठता के साथ मूल्यपरकता ने इन कहानियों को और अधिक अर्थवान बनाया है। आत्मिक बधाई राठी जी !
डा. रमाकांत शर्मा
सुप्रसिद्ध रचनाकार एवं आलोचक