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जन्म : 05 नवंबर 1955, जोधपुर
 शिक्षा: एम.काॅम , सीएआईआईबी
प्रकाशित कृतियांकहानी-संग्रह- अगोचर, साँप-सीढ़ी, आधार, पीढ़ियां, पहली बरसात, माटीके दीये, नेति-नेति, कायनात, परमात्मा नदारद है, कॉर्बेल का उपहार, हरिप्रकाश राठी  की कहानियां भाग 1 एवं भाग 2 
निबंध-संग्रह:  समय सत्य और संवेदना, अब तो सच कहो, किसकेरोके रुका है सवेरा
अनुवाद - उर्दू, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, राजस्थानी, उड़िया, ’आन द विंग्स ऑफ कुरजां ’ कतिपय कहानियों का अंग्रेजीअनुवाद है।राजस्थान के ख्यात साहित्यकार श्री मनोहरसिंह राठौड़ द्वारा वर्ष 2021 में लेखक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पुस्तक ' एक बेजोड़ कथाशिल्पी : हरिप्रकाश राठी ' का प्रकाशन।
सम्मान - राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 2023-24 में विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, इंडिया नेटबुक्स दिल्ली द्वारा साहित्य भूषण सम्मान, प्रतिष्ठित राही संस्थान जयपुर एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद , पुणे दोनों द्वारा जारी प्रथम सौ वैश्विक हिंदी साहित्यकारों की सूची में स्थान।पंजाब  कला साहित्य अकादमी द्वारा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान 2010, जैमिनी अकादमी हरियाणा द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सृजनहेतु ’राजस्थान रत्न’ , राष्ट्रकिंकर नईदिल्ली द्वारा संस्कृति सम्मान, वीरदुर्गादास राठौड़ सम्मान, सर्वश्रेष्ठ कथा-सृजन हेतु कथाबिंब पत्रिकाद्वारा दो बार ’कमलेश्वर स्मृति कथा - पुरस्कार वर्ष 2018 एवं 2021, सृजन गाथा.काॅम द्वारा यूनान, एथेंस में विधागत  श्रेष्ठता हेतु सलेखचंद जैन सम्मान 2018 , इसी संस्थान द्वारा मास्को में गुरू जम्भेश्वर सम्मान 2019, साहित्य मण्डल नाथद्वारा द्वारा ’हिंदी भाषा भूषण सम्मान ’ 2015, निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान , बस्ती ( उत्तरप्रदेश ) द्वारा राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान , पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी एवं यूनेस्को द्वारा सम्मानित

ईमेल- hariprakashrathi@yahoo.co.in


कथाकार हरिप्रकाश राठी का जन्म पश्चिमी राजस्थान के सिंहद्वार जोधपुर शहर में दिनांक 05 नवम्बर 1955 को सांयः 07ः37 पर हुआ। वे अपने पिता गोपीकृष्ण राठी की पांचवी संतान थे। उनसे छोटा एक भाई एवं बड़ों में दो भाई एवं दो बहने थी। श्री राठी का ननिहाल कोटा जिले के देवली गांव में था हालांकि उन्होंने अपना ननिहाल कभी नहीं देखा क्योंकि उनकी माता उनके नाना-नानी की एकमात्र संतान थी एवं वे दोनों श्री राठी के जन्म के पहले ही स्वर्गस्थ हो चले थे। श्री राठी की कहानियों में इसीलिए मामा-मामी, मौसा-मौसी एवं नाना-नानी जैसे किरदार कम मिलते हैं।

 

श्री राठी का बचपन अत्यन्त अभावों में बीता एवं निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की यह त्रासदी उनकी अनेक कहानियों में परिलक्षित भी है। उनकी शिक्षा जोधपुर शहर के ही विद्यालय ’श्री हनवंत हायर सैकेण्डरी स्कूल’ में हुई जहां वे 1960 से 1971 तक विद्यार्थी रहे। इस विद्यालय में सभी धर्म-जातियों के बच्चे थे। वे जिस मौहल्ले आड़ा बाजार में पले-बढे वहां भी आधी जनसंख्या मुसलमानों की थी। राठी की उन सभी कहानियों, जिनमें किरदारों के बचपन का चित्रण है, एकाध मुस्लिम सहपाठी अवश्य है। इस संगत ने ही संभवतः उन्हें सिखाया कि इंसान का असल मज़हब इंसानियत है। 


श्री राठी के माता का नाम सोहिनी देवी था एवं वह एक अत्यंत धर्मपरायण महिला थी। उनके  पिता घर से कुछ दूरी पर पुस्तकें बेचने का व्यवसाय करते थे। दोपहर उनके पिता भोजन करने घर जाते तो श्री राठी को दुकान बैठना होता था, इसी क्रम में श्री राठी को पुस्तकें पने का चस्का लग गया। उनकी दुकान पर अधिकांशतः धार्मिक पुस्तकें, प्रतिष्ठित लेखकों विशेषतः प्रेमचंद के कथा-उपन्यास भी बिकते थे, श्री राठी का ध्यान इन पुस्तकों के विक्रय की बजाय इन पुस्तकों को पढ़ने पर अधिक होता था। इन्हीं पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते साहित्य के अंकुर उनके जेहन में पैठ गये। 


श्री राठी की कॉलेज शिक्षा जोधपुर विश्वविद्यालय में हुई जहां 1971 से 1976 के मध्य उन्होंने बी.काॅम आनर्स, एम.काॅम किया। उनके काॅलेज शिक्षा के समय उनके पिता की आर्थिक स्थिति विपन्न थी अतः उन्होंने पार्टटाईम कार्य कर काॅलेज फीस, किताबें आदि का खर्च भी वहन किया। श्री राठी की अनेक कहानियों में इसीलिए किरदारों के संघर्ष का जीवंत चित्रण है। उनके किरदार न थकते हैं, न हारते हैं, वरन् संघर्ष कर अपने मुका पर पहुंचते हैं। 


श्री राठी का विवाह 17 जून 1979 को डा. सुशीला के साथ हुआ जो अत्यन्त विदुषी वरन् राठी से कहीं अधिक शिक्षित थी । उन्होंने सरकारी कॉलेज शिक्षा विभाग में वर्षों अध्यापन कार्य किया। कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले सुख-दुख, नोंक-झोंक भी राठी की कहानियों में मिल जाते हैं। 


श्री राठी ने वर्ष 1975 में यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया में लिपिक के रूप में कार्यग्रहण किया एवं मात्र दो वर्ष में प्रोबेशनरी अधिकारी बन गये। उन्होंने इस बैंक में 25 वर्ष तक कार्य किया एवं वर्ष 2001 में बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने तक उनका लेखन शून्य था लेकिन जैसा कि ऊपर लिखा है उनमें साहित्य के सुषुप्त अंकुर तो उपस्थित थे ही। 


श्री राठी की साहित्यिक यात्रा वस्तुतः वर्ष 2002 से प्रारंभ हुई। वीआरएस के पश्चात् एक बार यूं ही खाली बैठे उन्होंने कहानी ’अमरूद का पेड़’ लिखी। यह कहानी कालांतर में बहुत लोकप्रिय भी हुई। जब यह कहानी अखबार में प्रकाशित हुई तो उनकी कल्पना को पंख लग गये। उसके पश्चात् उन्होंने दो-तीन और कहानियां लिखी एवं जब वे भी प्रकाशित हो गई तो उन्हें सुस्पष्ट हो गया कि उनके भीतर एक कथाकार जन्म ले चुका है। उसके पश्चात् तो लेखन उनकी आदत बन गयी एवं वर्ष 2001 से 2020 के मध्य उन्होंने करीब 150 कहानियां लिख डाली। यह कहानियां अखबारों एवं अनेक पत्र-पत्रिकाओें में समय-समय पर प्रकाशित होती रही। श्री राठी की यह साहित्यिक यात्रा दिलचस्प है। लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार स्व. श्री जबरनाथ पुरोहित ने अपनी पुस्तक ’गद्गद्  गिरा नयन बह नीरा’ में ’अर्थनगर से भावनगर तक’ शीर्षक से उन पर एक लेख भी प्रकाशित किया है, इतना ही नहीं उन्होंने लिखा भी है कि श्री राठी उन चंद समकालीन साहित्यकारों में हैं  जिनसे वे प्रभावित हुए हैं। यही बात बिज्जी, प्रो. हरिराजसिंह, प्रो. शरद पगारे, प्रो. शंभुनाथ तिवारी, श्री गिरी पंकज, प्रो. प्रबोध कुमार गोविल, श्री प्रेम जनमेजय, श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव, डा. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, डा. देवेन्द्र जोशी  एवं अन्य अनेक पाठकों / समीक्षकों ने दोहराई है। इसी दरम्यान श्री राठी अनेक समसामयिक विषयों पर भी लिखते रहे हैं एवं विविध विषयों पर उनके पांच सौ से अधिक लेख समाचार पत्रों के सम्पादकीय पृष्ठों एवं अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं।