मुझे खुद नहीं मालूम मैं उस म्यूजियम में कब एवं कैसे बंद हो गया ? आश्चर्य! जाते-जाते किसी ने कोई आवाज़ भी नहीं दी कि जो अंदर हैं, बाहर चले आएं। इतना तो उनका भी फर्ज़ बनता है…
वे आंखें
सर्दियों में सूरज को जाने क्या हो जाता है? उगता तो उंघते-उंघते है पर डूबने को इस कदर उतावला होता है मानो उसे किसी ने अपमानित कर दिया हो एवं वह अंधेरे के आगोश में मुंह छुपा लेना…
महाभूत
अरावली की ऊंची, खूबसूरत पहाड़ियों के नीचे पसरे ख्वाज़ा के शहर अजमेर के बारे में तो कई लोग जानते हैं पर कम लोग इसके नज़दीक बसे ब्यावर कस्बे के बारे में जानते हैं जिसकी प्राकृतिक छटा अजमेर से…
किलकारी
ब्रह्ममुहूर्त में उठना अच्छी बात है पर कुछ लोग इस समय इसलिए नहीं उठते कि वे इस घड़ी की महत्ता समझते हैं, वे इस कारण उठते हैं कि उन्हें मजबूरी उठा देती है। मजबूरी के अनुभव स्वाध्याय के…
चमगादड़ें
मेरे जैसा एक्सट्रोवर्ट यानि बहिर्मुखी व्यक्ति आपको शायद ही कहीं मिले। मुझे लोगों से मिलने, बात करने, उनसे मन बांटने, उनकी कथा-व्यथा सुनने आदि-आदि बातों में अतुलित आनन्द आता है। मुझे वे लोग जरा नहीं सुहाते जो कछुए…
चुगता मोती हंस
पति-पत्नी दोनों में बराबर की बहस चल रही थी। पति तीस पार छरहरे बदन का युवक था। गेहुंआ रंग, ऊंचा कद, राजसी नाक, सुंदर आंखें एवं पौरूषेय चेहरा उसके व्यक्तित्व को एक अलग आयाम देते। रसीले होंठ, बैल…
इमिग्रेशन
हमारे देश में अनेक गांव-कस्बे-शहर हैं तो इनकी संख्या के कई गुना मोहल्ले हैं। यह भी सच है सभी अपने मोहल्लों को वैसे प्यार करते हैं जैसे वे अपनी धन-संपदा एवं औलादों को करते हैं। यह स्वाभाविक है…
हेमू की आंख का तीर
मुझे नहीं मालूम मैं बैंक मैनेजर क्यों बना पर ईश्वर यदि ऐसी नौकरी की बजाय मुझे इतिहास अथवा पुरातत्व का प्रोफेसर बना देता तो आम के आम गुठली के दाम वाली बात बन जाती। जाने ये महाजनी मेरे…
रोशनी
मुझे ठीक से याद तो नहीं आ रहा कि नेताराम हमारे यहां किसके मार्फत आया था, शायद मेरी बैंक के किसी ग्राहक ने उसके बारे में बताया था, पर इतना जरूर याद है वह हमारे यहां आया तब…
लैम्पपोस्ट
मैं जब भी घर से निकलता वे मुझे इस तरह देखते मानो कच्चा खा जाएंगे। देखते हुए उनका चेहरा हिदायतों का इश्तिहार बन जाता। अनेक बार उनकी बड़ी-बड़ी आंखों से गोलियां बरसतीं। कभी मैं उनकी तरफ नहीं देखता…
निज मन मुकुर सुधार
मेरे घर के ठीक सामने गोल बगीचे के आगे लगे गुलमोहर के फूल एवं पत्ते अब गिरने लगे हैं। लगता है पतझड़ इसे नंगा करके मानेगा। अभी कुछ माह पूर्व यह दूल्हे की तरह सजा था, नीचे होकर…
नवभोर
आज पापा के निःधन का चौथा दिन था। बाहर से शोक प्रकट करने आए सभी मित्र-रिश्तेदार अब तक जा चुके थे। पापा का जाना घर पर गाज़ गिरने जैसा था। ईश्वर का शुक्र है गत माह मैं सरकारी…